मई-जून 2019 में, 65 फीसदी भारतीय गर्म लहरों की चपेट में,जुलाई 2019 भारत का अब तक सबसे गर्म महीना

उपग्रह डेटा के अनुसार मई और जून, 2019 में भारत की लगभग दो-तिहाई आबादी 40 डिग्री सेल्सियस से अधिक तापमान (सतह माप) के संपर्क में थी। 2018 में यह 52.94फीसदी लोग चपेट में थे। Data: GFS Temperature Estimates, GPWv4, MODIS (LPDAAC – NASA); Processed by Raj Bhagat Palanichamy using Google Earth Engine.

बेंगलुरु / जेनेवा: भारतीय मौसम विज्ञान के इतिहास में जुलाई 2019 अब तक का सबसे गर्म महीना था और मई और जून, 2019 के बीच भारत की 65.12 फीसदी आबादी 40 डिग्री सेल्सियस से अधिक तापमान के संपर्क में थी। यह जानकारी एक नए विश्लेषण में सामने आई है। 

भारत के वर्ल्ड रीसॉर्स इन्स्टिटूट में में एक पृथ्वी पर्यवेक्षराज भगत पलानीचामी द्वारा इंडियास्पेंड के लिए किए गए विश्लेषण के अनुसार, 2016 में, भारत की 59.32 फीसदी आबादी को हीटवेव का सामना करना पड़ा, 2017 में यह संख्या बढ़कर 61.4 फीसदी हो गई और 2018 में घटकर 52.94 फीसदी रह गई।

पलानीचामी के अनुसार, यह केवल 2016 में था कि उपग्रह डेटा ने इस तरह के एक विस्तृत विश्लेषण के लिए पर्याप्त सुधार किया है। लेकिन 1992 के बाद से 2015 में भारत में सबसे खराब हीटवेव देखी गई है, दिल्ली से तेलंगाना तक के क्षेत्रों तक लोगों को हीट वेव का सामना करना पड़ा और 2,081 लोग मारे गए। यह विश्व इतिहास में पांचवां सबसे घातक था।

25 जून, 2019 को, इंडियन मीटीऑरलाजिकल डिपार्टमेंट (आईएमडी) के अनुसार झारखंड, असम और मेघालय के कुछ हिस्सों में तापमान 5.1 डिग्री सेल्सियस से अधिक था, जो ‘सामान्य से ज्यादा’ के रूप में वर्गीकृत है। उप-हिमालयी पश्चिम बंगाल और सिक्किम में तापमान सामान्य से 3.1 डिग्री सेल्सियस अधिक था या, जैसा कि आईएमडी ने इसे ‘सामान्य से ज्यादा’ बताया।

वर्ल्ड मीटीऑरलाजिकलविश्व ऑर्गनिऐएशन (डब्लूएमओ) और यूरोपीय संघ के कोपरनिकस क्लाइमेट चेंज प्रोग्राम, की ओर से पृथ्वी अवलोकन के नवीनतम आंकड़ों के अनुसार, पूर्व-औद्योगिक युग के ऊपर जुलाई तापमान 1.2 डिग्री सेल्सियस के साथ,वैश्विक तापमान रिकॉर्ड 2019 की गर्मियों के दौरान टूट गया।

जलवायु परिवर्तन से संबंधित विज्ञान का आकलन करने के लिए स्थापित किया, संयुक्त राष्ट्र का निकाय, जलवायु परिवर्तन पर अंतर सरकारी पैनल (आईपीसीसी) की अक्टूबर 2018 की रिपोर्ट के अनुसार, वैश्विक CO2 (कार्बन डाइऑक्साइड) उत्सर्जन में वृद्धि जारी रहने के कारण, हीटवेव के लगातार और अधिक तीव्र होने की संभावना है। इसके परिणाम घातक होंगे।

गांधीनगर में इंडियन इंस्टयूट ऑफ टेक्नॉलोजी के शोधकर्ताओं द्वारा नवंबर 2018 के एक अध्ययन के अनुसार यदि इस सदी के अंत तक वैश्विक तापमान वृद्धि को 1.5 डिग्री तक रोकने में कामयाबी मिली तो भारत को हीटवेव में चार गुना वृद्धि देखने को मिलेगी। 

यदि दुनिया वैश्विक तापमान वृद्धि को रोकने में विफल रहती है, तो भारत हीटवेव में आठ गुना वृद्धि देख सकता है।

इससे रुग्णता और मृत्यु दर दोनों में वृद्धि हो सकती है। हीटवेव के कारण शरीर का मुख्य तापमान बढ़ सकता है। अध्ययनों से पता चलता है कि सीमित जोखिम से निर्जलीकरण और चक्कर आ सकते हैं, लेकिन हीटवेव के उच्च जोखिम से कई अंगों को नुकसान हो सकता है, जैसा कि अध्ययन सुझाव देते हैं।

2010 और 2018 के बीच, भारत में 6,167 गर्मी से संबंधित मौतें हुईं, जैसा कि इंडियास्पेंड ने अप्रैल 2019 में बताया था। वर्ष 2015 में सबसे अधिक मृत्यु की सूचना दी गई: उस साल गर्मी से संबंधित सभी मौतों का आंकड़ा 2,081 या 34 फीसदी है।

लोकसभा में दिए गए एक बयान के अनुसार, 2019 में, 16 जून तक 94 मौतें हुईं। जून के अंत तक यह संख्या बढ़कर 210 हो गई, जिसमें बिहार से सबसे ज्यादा, 118 मौतें हुईं।

एक महामारी विज्ञानी और शोधकर्ता गुलरेज अजहर ने कहा,“ हीटवेव अवधि के दौरान मौतों की एक विशाल संख्या सामान्य मृत्यु के रूप में पंजीकृत हैं (कार्डियोरेस्पिरेटरी अरेस्ट आदि से) , लेकिन यह मौतें नहीं हुई होती अगर इतना गर्म नहीं होता।” गुलरेज अज़हर ने गुजरात में गांधीनगर के इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ पब्लिक हेल्थ (आईआईपीएच) में चार साल तक हीटवेव से होने वाली मौतों का अध्ययन किया है। 

दिन के तापमान के साथ-साथ रात में भी गर्मी बढ़ रही हैं।

आईआईटी-गांधीनगर के एसोसिएट प्रोफेसर विमल मिश्रा, जिन्होंने अध्ययन का सह-लेखन किया और जलवायु परिवर्तन अनुसंधान पर ध्यान केंद्रित किया, ने कहा, "ज्यादातर हम दिन के समय की गर्मी पर ध्यान केंद्रित करते हैं। ठंडी रातें कुछ राहत देती हैं। लेकिन ऐसे परिदृश्य के बारे में सोचें जहां दिन और रात दोनों गर्म हों।" 

लेकिन भारत इसका अपवाद नहीं है।

दुनिया भर में रिकॉर्ड तापमान और मानव प्रभाव

Global average temperatures for the month of July were close to 1.2 deg C above the pre-industrial level as defined by the Intergovernmental Panel on Climate Change, according to the Copernicus Climate Change Service (C3S).

बर्फ से ढकी आल्प्स से घिरे स्विट्जरलैंड की राजधानी जेनेवा ने इस जुलाई में असामान्य रूप से तेज गर्मी की सूचना दी। तापमान 36 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच गया, जो महीने के 24 डिग्री सेल्सियस के औसत दिन-समय के तापमान से ऊपर है, और स्विस सरकार को गर्मी से 'गंभीर खतरे' का संकेत देते हुए एक दुर्लभ लेवल -4 हीट अलर्ट जारी करना पड़ा।

25 जुलाई को फ्रांस की राजधानी पेरिस में 42.6 डिग्री सेल्सियस तापमान दर्ज किया, 24 डिग्री सेल्सियस के जुलाई औसत की तुलना में एक सर्वकालिक उच्च। यूनाइटेड किंगडम की राजधानी लंदन में भी 22 डिग्री सेल्सियस के अपने जुलाई औसत के मुकाबले 34 डिग्री सेल्सियस के तापमान दर्ज किया। बेल्जियम में अधिकारियों ने एक चेतावनी जारी की, जब 66 वर्षीय महिला की मौत के लिए हीटवेव को जिम्मेदार ठहराया गया था।

अमेरिका भी देश भर में रिकॉर्ड उच्च तापमान के लिए तैयार है।

ग्रीनलैंड एक ऐसा देश है,जहां बर्फ के ग्लेशियर सतह के 82 फीसदी क्षेत्र को कवर करते हैं। वहां 31 जुलाई, 2019 को 10 बिलियन टन से अधिक बर्फ खत्म हो गया। इसे परिप्रेक्ष्य में रखने के लिए, यह 1 बिलियन टन 400,000 ओलंपिक आकार के स्विमिंग पूल के बराबर है। इसका मतलब यह भी है कि वैश्विक समुद्री स्तर और अधिक बढ़ेगा।

पिछले महीने के लिए औसत वैश्विक तापमान - जून 2019 - रिकॉर्ड किए गए इतिहास में भी उच्चतम था। जून 2016 की तुलना में यह 0.1 डिग्री सेल्सियस अधिक था, जिसने अब तक का सबसे गर्म रहने का रिकॉर्ड रखा था।

मानवीय गतिविधयां दोषी!

हीटवेव की बढ़ती आवृत्ति और तीव्रता पर विज्ञान ने मानव गतिविधि को दोषी ठहराया गया है। 2004 में इस तरह के पहले अध्ययन के बाद विज्ञान ने इस बात की पुष्टि की है कि हीटवेव के लिए मानव प्रभाव ज्यादा जिम्मेदार हैं।

मौसम के बदलाव के लिए एक विशेष चरम मौसम की घटना को जोड़ना मुश्किल है, जैसा कि कोपर्निकस क्लाइमेट चेंज सर्विस (C3S) के वरिष्ठ वैज्ञानिक फ्रेजा वम्बर्ग कहते हैं। वह कहते हैं, " अध्ययन करने के लिए आपको एक लंबे समय के लिए बहुत अच्छे डेटा की आवश्यकता होती है। दुनिया के कुछ हिस्सों में इस तरह के अध्ययन मुश्किल हो सकते हैं, क्योंकि अवलोकन डेटा समरूप नहीं हो सकता है।"

वम्बर्ग के अनुसार, जो सामने है, उससे साफ है कि आने वाले वर्षों में इस तरह के हीटवेव के मानक होने की संभावना है।

एक हीटवेव, जैसा कि हमने उल्लेख किया है, एक विशेष तापमान स्तर को पार करने के बारे में नहीं है, बल्कि यह किसी स्थान विशेष के औसत तापमान से कितना अधिक है। उदाहरण के लिए, उत्तरी भारत में, एक हीटवेव 40 डिग्री सेल्सियस से ऊपर का तापमान वार करेगी, लेकिन स्विट्जरलैंड में यह 29 डिग्री सेल्सियस और उससे अधिक होगा। हालांकि, ऐसे स्थानों में जो नियमित रूप से उच्च तापमान झेलते हैं, लोग विभिन्न प्रकार के तंत्र विकसित करते हैं।

लेकिन समशीतोष्ण क्षेत्रों में ग्रीष्मकाल में लोग हीटवेव के लिए तैयार नहीं हैं। अकेले फ्रांस में अब तक हीटवेव से पांच मौतें हुई हैं।

विशेषज्ञों के अनुसार, भारत में, जहां गर्मी का मौसम आम है, यहां भी तापमान में और वृद्धि से कुछ क्षेत्र अच्छी तरह से कुप्रभावित हो सकते हैं।

अगर सीओ- 2 उत्सर्जन नही रूका तो अगले कुछ दशकों में भारत, पाकिस्तान और बांग्लादेश जानलेवा गर्मी की चपेट में आ जाएंगे, जैसा कि मैसाचुसेट्स इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी (MIT) के शोधकर्ताओं द्वारा 2017 का अध्ययन कहा गया है। अध्ययन में कहा गया है कि भारत-गंगा के मैदान में इसका प्रभाव विशेष रूप से गंभीर होगा।

Upto 37% of Indians were exposed to high temperatures (air temperature) of over 40 deg C for 10 hours or more in a day in 2019, up from 27.42% in 2018, according to satellite data. Data: GFS Temperature Estimates, GPWv4, MODIS (LPDAAC - NASA); Processed by Raj Bhagat Palanichamy using Google Earth Engine.

हीटवेव-जलवायु परिवर्तन लिंक

वैश्विक ग्रीनहाउस-गैस उत्सर्जन को निर्धारित करने के लिए कई शोध संस्थानों के बीच एक सहयोगात्मक प्रयास, ग्लोबल कार्बन प्रोजेक्ट से दिसंबर 2018 की रिपोर्ट के अनुसार, वैश्विक स्तर पर, सीओ-2 उत्सर्जन में वृद्धि जारी है और, 2016में 6 फीसदी की तुलना में 2017 में लगभग 7 फीसदी भारत से आया है।

ग्रीनहाउस गैस होने के नाते, सीओ-2 सूरज की गर्मी को ट्रैप करती है, जिससे भूमि की सतह का तापमान बढ़ जाता है। सामान्य तापमान की तुलना में ऊष्मा अधिक होती है। इसलिए, जलवायु परिवर्तन और हीटवेव के बीच का संबंध प्रत्यक्ष है।

वम्बर्ग कहते हैं, "हम जानते हैं कि सभी भूमि सतह क्षेत्रों - शायद ही कोई अपवाद हैं - पिछले 150 वर्षों में तापमान में वृद्धि देखी गई है। कुछ क्षेत्र तेजी से गर्म होते हैं और कुछ क्षेत्र धीमे-धीमे गर्म होते हैं।"

बढ़ते तापमान और हीटवेव के बीच यह संबंध भी एक रैखिक नहीं है। आईआईटी-गांधीनगर के मिश्रा ने कहा, "इसका क्या मतलब है: यदि तापमान में वृद्धि (वैश्विक) के बिना आपके पास 10 वर्षों में पांच हीटवेव हैं, तो आधा डिग्री सेल्सियस के तापमान में वृद्धि के साथ आप 10 वर्षों में सात हीटवेव होंगे। और अगर तापमान 1 डिग्री सेल्सियस बढ़ जाता है तो अचानक पांच साल में 20 हीटवेव हो सकती हैं।”

लेकिन वैश्विक तापमान परिवर्तनों का प्रभाव दुनिया भर में अलग-अलग होगा। और नमी का स्तर बढ़ना, इसमें एक कारक होगा।

दिल्ली में सेंटर फॉर एटमॉस्फेरिक साइंसेज, इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी के कृष्ण अचुतराव ने कहा, "हवा तापमान में हर डिग्री के लिए 7 फीसदी तक अधिक नमी पकड़ सकती है। इस प्रकार तटीय शहरों में, जहां हवा नम हो जाती है, तापमान में वृद्धि के साथ आर्द्रता का स्तर बढ़ जाएगा। जब नमी अधिक होती है, तो पसीना शरीर पर रहता है और कोई शीतलन प्रभाव नहीं होता है। इसीलिए मानसून के दौरान गर्मी अधिक दमनकारी लगती है।"

जबकि एक हीटवेव की घोषणा करते समय आईएमडी केवल तापमान वृद्धि को ध्यान में रखता है, वैज्ञानिकों ने एक गर्मी सूचकांक का सुझाव दिया जो तापमान वृद्धि और आर्द्रता दोनों को ध्यान में रखता है।

हीटवेव से नुकसान

तापमान में कितनी वृद्धि हुई है, कितनी देर और कितनी भूमि पर है, इस पर निर्भर करता है कि एक हीटवेव मानव जीवन को विभिन्न तरीकों से प्रभावित कर सकती है। आईआईटी-गांधीनगर के मिश्रा ने कहा, "आपके पास एक साल में तीव्र हीटवेव हो सकती है, लेकिन यह 2015 में (भारत में) देखा जा सकता है। लेकिन इस साल की हीटवेव देश के लगभग दो-तिहाई हिस्से को कवर करती है। इसलिए, अगर हीटवेव की तीव्रता समान है लेकिन कवर किया गया क्षेत्र दो से तीन गुना अधिक है, तो हम अधिक नुकसान की उम्मीद कर सकते हैं। ”

यदि इन हीटवेव्स के अनुकूल होने का कोई प्रयास नहीं किया जाता है, तो इससे ज्यादा मौतें हो सकती हैं; स्वास्थ्य पत्रिका पीएलओएस में प्रकाशित दुनिया भर के 20 क्षेत्रों के 2018 के एक अध्ययन के अनुसार, क्षेत्रों में भिन्नताएँ अलग-अलग होंगी। अध्ययन में कहा गया है कि मौतों में सबसे अधिक वृद्धि कोलंबिया में हुई, इसके बाद फिलीपींस और ब्राजील में हुई। भारत सहित उष्णकटिबंधीय क्षेत्रों में मौतों में वृद्धि देखी जाएगी। 

हीटवेव्स को प्री-टर्म बर्थ,प्रजनन क्षमता में कमी, मानसिक स्वास्थ्य के मुद्दों में वृद्धि, भारत में किसान आत्महत्या की दर में वृद्धि और क्रोनिक किडनी रोग से जोड़ा गया है।

India is among the top 20 countries in the world to have seen the most number of extreme weather events between 1998 and 2017, according to a 2019 report by a German non-profit that tracks climate risk.

जबकि गर्भवती महिलाएं, बुजुर्ग, और बच्चे विशेष रूप से संवेदनशील होते हैं। सेंटर फॉर एनवायरनमेंट एंड डेवलपमेंट, अशोका ट्रस्ट फॉर इकोलॉजी एंड एनवायरनमेंट या एटीआरईई में फेलो, शोएबल चक्रवर्ती ने कहा, "गर्मी का जोखिम आर्थिक वर्ग से संबंधित है। यह अनिवार्य रुप से उनसे जुड़ा है वो गरीब हैं और उन्हें गर्मी में काम करना होता है।"

जलवायु परिवर्तन के संदर्भ में इक्विटी का अध्ययन करने वाले चक्रवर्ती के अनुसार, अनौपचारिक क्षेत्र में काम करने वाले, विशेष रुप से संवेदनशील दिहाड़ी मजदूर, हीटवेव से सबसे अधिक प्रभावित होते हैं। 1991 में नवीनतम नमूना उपलब्ध राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण कार्यालय (एनएसएसओ) के आंकड़ों पर इंडियास्पेंड विश्लेषण के अनुसार, 1991 में अर्थव्यवस्था के उदारीकरण के बाद से 22 वर्षों में बनाई गई लगभग 61 मिलियन नौकरियों में, 92 फीसदी अनौपचारिक नौकरियां थीं।

इंडियास्पेंड के लिए डब्ल्यूआरआई के पलानीचामी द्वारा विश्लेषण के अनुसार, इस साल 37 फीसदी आबादी, 10 घंटे से ज्यादा या एक दिन के लिए 40 डिग्री सेल्सियस से अधिक तापमान के संपर्क में थी, जो कि पिछले चार वर्षों में सबसे ज्यादा है।

2016 में, यह संख्या 31.79 फीसदी थी, जो 2017 में 34.19 फीसदी हो गई और 2018 में गिरकर 27.42 फीसदी हो गई।

शिकागो विश्वविद्यालय के एनर्जी पॉलिसी इंस्ट्यूट में चल रहे भारत-केंद्रित अध्ययन के प्रारंभिक परिणामों के अनुसार, हीटवेव उत्पादकता में भी कमी लाती है। तापमान में प्रत्येक गिरावट सी वृद्धि के साथ उत्पादकता 2-4 फीसदी घट जाती है।

Parts of Greenland has seen temperatures 10 to 15 deg C above normal causing glaciers to melt, according to the World Meteorological Organization.

वायु प्रदूषण और हीटवेव

अचूताराव द्वारा सह-अध्ययन के अनुसार, भारत को जलवायु मॉडल के अनुमान के मुकाबले कम गर्मी का सामना करना पड़ रहा है।

जैसा कि जलवायु परिवर्तन होता है, उम्मीद है कि चरम तापमान - एक क्षेत्र में प्रत्येक वर्ष के सबसे गर्म दिन पर अधिकतम तापमान - बढ़ता रहेगा।

आईआईटी-दिल्ली के अचुतराओ ने कहा, "अमेरिका, रूस और यूरोप में हुए सभी अध्ययनों में ऐसा हुआ है, लेकिन यह भारत में नहीं हुआ है।”

वैज्ञानिकों को संदेह है कि इससे दो कारकों का पता लगाया जा सकता है: वायु प्रदूषण और सिंचाई। अचुतराव ने कहा,यदि भारत को अपनी वायु को साफ करना है, तो इस तरह सूर्य के प्रकाश को अवरुद्ध करने वाले तत्वों को मिटाना है, गर्मी के स्तर के ऊपर जाने की संभावना है। जो अस्पष्ट है, वह ठीक यही है कि एक बार प्रदूषण को तस्वीर से बाहर निकालने के बाद हीटवेव कितनी बढ़ जाएगी।

वायु प्रदूषण सिर्फ गैसों की उपस्थिति के कारण नहीं . बल्कि एरोसोल (हवा में ठोस या तरल कण) के कारण होता है। मई 2019 में एक इंडियास्पेंड की रिपोर्ट में बताया गया है कि कुछ एयरोसोल्स का वार्मिंग प्रभाव होता है, इसका मतलब यह है कि स्थानीय प्रदूषण, नमी के स्तर और सतह के जल निकायों की प्रकृति के आधार पर, विभिन्न क्षेत्रों में या तो गर्मी के स्तर में वृद्धि या गिरावट का अनुभव होगा, जब प्रदूषण साफ हो जाएगा।

सिंचाई से भूमि पर शीतलन प्रभाव पड़ता है। लेकिन यह प्रभाव छोटा और स्थानीय है। आईआईटी-गांधीनगर के मिश्रा ने कहा, " जब गर्मी पड़ती है और उस समय तक अधिकांश फसलें कट चुकी होती हैं।"

आगे बढ़ने का रास्ता

भविष्य की तैयारी में दो चरण शामिल होंगे: शमन और अनुकूलन। अचुताराव ने कहा, "भविष्य में हीटवेव को कम करने के संदर्भ में, एकमात्र तरीका सीओ-2 उत्सर्जन को नियंत्रित करना है।" इसमें वैश्विक प्रयास शामिल होगा।

सीओ-2 के उत्सर्जन को कम करने और मौजूदा वनों की सुरक्षा के लिए नवीकरणीय ऊर्जा पर ध्यान केंद्रित करना अन्य महत्वपूर्ण शमन उपाय हैं। अनुकूलन में अधिक वृक्षों के आवरण पर ध्यान देने के साथ बेहतर शहरी नियोजन शामिल होगा और सतह के जल निकायों को बढ़ाना होगा जो एक स्थानीय शीतलन प्रभाव रखते हैं।

एटीआरईई से चक्रवर्ती कहते हैं, "जलवायु परिवर्तन के लिए एक एकीकृत दृष्टिकोण और कम से कम देश में गर्मी और शीतलन के प्रबंधन की आवश्यकता है। इन सभी उपायों के बाद भी, हीटवेव होगी, लेकिन उनका प्रभाव कम हो जाएगा"।

(शेट्टी इंडियास्पेंड के साथ रिपोर्टिंग फेलो हैं।)

( यह लेख मूलत: अंग्रेजी में 10 अगस्त 2019 को IndiaSpend.com पर प्रकाशित हुआ है। )

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बेंगलुरु / जेनेवा: भारतीय मौसम विज्ञान के इतिहास में जुलाई 2019 अब तक का सबसे गर्म महीना था और मई और जून, 2019 के बीच भारत की 65.12 फीसदी आबादी 40 डिग्री सेल्सियस से अधिक तापमान के संपर्क में थी। यह जानकारी एक नए विश्लेषण में सामने आई है। 

भारत के वर्ल्ड रीसॉर्स इन्स्टिटूट में में एक पृथ्वी पर्यवेक्षराज भगत पलानीचामी द्वारा इंडियास्पेंड के लिए किए गए विश्लेषण के अनुसार, 2016 में, भारत की 59.32 फीसदी आबादी को हीटवेव का सामना करना पड़ा, 2017 में यह संख्या बढ़कर 61.4 फीसदी हो गई और 2018 में घटकर 52.94 फीसदी रह गई।

पलानीचामी के अनुसार, यह केवल 2016 में था कि उपग्रह डेटा ने इस तरह के एक विस्तृत विश्लेषण के लिए पर्याप्त सुधार किया है। लेकिन 1992 के बाद से 2015 में भारत में सबसे खराब हीटवेव देखी गई है, दिल्ली से तेलंगाना तक के क्षेत्रों तक लोगों को हीट वेव का सामना करना पड़ा और 2,081 लोग मारे गए। यह विश्व इतिहास में पांचवां सबसे घातक था।

25 जून, 2019 को, इंडियन मीटीऑरलाजिकल डिपार्टमेंट (आईएमडी) के अनुसार झारखंड, असम और मेघालय के कुछ हिस्सों में तापमान 5.1 डिग्री सेल्सियस से अधिक था, जो ‘सामान्य से ज्यादा’ के रूप में वर्गीकृत है। उप-हिमालयी पश्चिम बंगाल और सिक्किम में तापमान सामान्य से 3.1 डिग्री सेल्सियस अधिक था या, जैसा कि आईएमडी ने इसे ‘सामान्य से ज्यादा’ बताया।

वर्ल्ड मीटीऑरलाजिकलविश्व ऑर्गनिऐएशन (डब्लूएमओ) और यूरोपीय संघ के कोपरनिकस क्लाइमेट चेंज प्रोग्राम, की ओर से पृथ्वी अवलोकन के नवीनतम आंकड़ों के अनुसार, पूर्व-औद्योगिक युग के ऊपर जुलाई तापमान 1.2 डिग्री सेल्सियस के साथ,वैश्विक तापमान रिकॉर्ड 2019 की गर्मियों के दौरान टूट गया।

जलवायु परिवर्तन से संबंधित विज्ञान का आकलन करने के लिए स्थापित किया, संयुक्त राष्ट्र का निकाय, जलवायु परिवर्तन पर अंतर सरकारी पैनल (आईपीसीसी) की अक्टूबर 2018 की रिपोर्ट के अनुसार, वैश्विक CO2 (कार्बन डाइऑक्साइड) उत्सर्जन में वृद्धि जारी रहने के कारण, हीटवेव के लगातार और अधिक तीव्र होने की संभावना है। इसके परिणाम घातक होंगे।

गांधीनगर में इंडियन इंस्टयूट ऑफ टेक्नॉलोजी के शोधकर्ताओं द्वारा नवंबर 2018 के एक अध्ययन के अनुसार यदि इस सदी के अंत तक वैश्विक तापमान वृद्धि को 1.5 डिग्री तक रोकने में कामयाबी मिली तो भारत को हीटवेव में चार गुना वृद्धि देखने को मिलेगी। 

यदि दुनिया वैश्विक तापमान वृद्धि को रोकने में विफल रहती है, तो भारत हीटवेव में आठ गुना वृद्धि देख सकता है।

इससे रुग्णता और मृत्यु दर दोनों में वृद्धि हो सकती है। हीटवेव के कारण शरीर का मुख्य तापमान बढ़ सकता है। अध्ययनों से पता चलता है कि सीमित जोखिम से निर्जलीकरण और चक्कर आ सकते हैं, लेकिन हीटवेव के उच्च जोखिम से कई अंगों को नुकसान हो सकता है, जैसा कि अध्ययन सुझाव देते हैं।

2010 और 2018 के बीच, भारत में 6,167 गर्मी से संबंधित मौतें हुईं, जैसा कि इंडियास्पेंड ने अप्रैल 2019 में बताया था। वर्ष 2015 में सबसे अधिक मृत्यु की सूचना दी गई: उस साल गर्मी से संबंधित सभी मौतों का आंकड़ा 2,081 या 34 फीसदी है।

लोकसभा में दिए गए एक बयान के अनुसार, 2019 में, 16 जून तक 94 मौतें हुईं। जून के अंत तक यह संख्या बढ़कर 210 हो गई, जिसमें बिहार से सबसे ज्यादा, 118 मौतें हुईं।

एक महामारी विज्ञानी और शोधकर्ता गुलरेज अजहर ने कहा,“ हीटवेव अवधि के दौरान मौतों की एक विशाल संख्या सामान्य मृत्यु के रूप में पंजीकृत हैं (कार्डियोरेस्पिरेटरी अरेस्ट आदि से) , लेकिन यह मौतें नहीं हुई होती अगर इतना गर्म नहीं होता।” गुलरेज अज़हर ने गुजरात में गांधीनगर के इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ पब्लिक हेल्थ (आईआईपीएच) में चार साल तक हीटवेव से होने वाली मौतों का अध्ययन किया है। 

दिन के तापमान के साथ-साथ रात में भी गर्मी बढ़ रही हैं।

आईआईटी-गांधीनगर के एसोसिएट प्रोफेसर विमल मिश्रा, जिन्होंने अध्ययन का सह-लेखन किया और जलवायु परिवर्तन अनुसंधान पर ध्यान केंद्रित किया, ने कहा, "ज्यादातर हम दिन के समय की गर्मी पर ध्यान केंद्रित करते हैं। ठंडी रातें कुछ राहत देती हैं। लेकिन ऐसे परिदृश्य के बारे में सोचें जहां दिन और रात दोनों गर्म हों।" 

लेकिन भारत इसका अपवाद नहीं है।

दुनिया भर में रिकॉर्ड तापमान और मानव प्रभाव

Global average temperatures for the month of July were close to 1.2 deg C above the pre-industrial level as defined by the Intergovernmental Panel on Climate Change, according to the Copernicus Climate Change Service (C3S).

बर्फ से ढकी आल्प्स से घिरे स्विट्जरलैंड की राजधानी जेनेवा ने इस जुलाई में असामान्य रूप से तेज गर्मी की सूचना दी। तापमान 36 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच गया, जो महीने के 24 डिग्री सेल्सियस के औसत दिन-समय के तापमान से ऊपर है, और स्विस सरकार को गर्मी से 'गंभीर खतरे' का संकेत देते हुए एक दुर्लभ लेवल -4 हीट अलर्ट जारी करना पड़ा।

25 जुलाई को फ्रांस की राजधानी पेरिस में 42.6 डिग्री सेल्सियस तापमान दर्ज किया, 24 डिग्री सेल्सियस के जुलाई औसत की तुलना में एक सर्वकालिक उच्च। यूनाइटेड किंगडम की राजधानी लंदन में भी 22 डिग्री सेल्सियस के अपने जुलाई औसत के मुकाबले 34 डिग्री सेल्सियस के तापमान दर्ज किया। बेल्जियम में अधिकारियों ने एक चेतावनी जारी की, जब 66 वर्षीय महिला की मौत के लिए हीटवेव को जिम्मेदार ठहराया गया था।

अमेरिका भी देश भर में रिकॉर्ड उच्च तापमान के लिए तैयार है।

ग्रीनलैंड एक ऐसा देश है,जहां बर्फ के ग्लेशियर सतह के 82 फीसदी क्षेत्र को कवर करते हैं। वहां 31 जुलाई, 2019 को 10 बिलियन टन से अधिक बर्फ खत्म हो गया। इसे परिप्रेक्ष्य में रखने के लिए, यह 1 बिलियन टन 400,000 ओलंपिक आकार के स्विमिंग पूल के बराबर है। इसका मतलब यह भी है कि वैश्विक समुद्री स्तर और अधिक बढ़ेगा।

पिछले महीने के लिए औसत वैश्विक तापमान - जून 2019 - रिकॉर्ड किए गए इतिहास में भी उच्चतम था। जून 2016 की तुलना में यह 0.1 डिग्री सेल्सियस अधिक था, जिसने अब तक का सबसे गर्म रहने का रिकॉर्ड रखा था।

मानवीय गतिविधयां दोषी!

हीटवेव की बढ़ती आवृत्ति और तीव्रता पर विज्ञान ने मानव गतिविधि को दोषी ठहराया गया है। 2004 में इस तरह के पहले अध्ययन के बाद विज्ञान ने इस बात की पुष्टि की है कि हीटवेव के लिए मानव प्रभाव ज्यादा जिम्मेदार हैं।

मौसम के बदलाव के लिए एक विशेष चरम मौसम की घटना को जोड़ना मुश्किल है, जैसा कि कोपर्निकस क्लाइमेट चेंज सर्विस (C3S) के वरिष्ठ वैज्ञानिक फ्रेजा वम्बर्ग कहते हैं। वह कहते हैं, " अध्ययन करने के लिए आपको एक लंबे समय के लिए बहुत अच्छे डेटा की आवश्यकता होती है। दुनिया के कुछ हिस्सों में इस तरह के अध्ययन मुश्किल हो सकते हैं, क्योंकि अवलोकन डेटा समरूप नहीं हो सकता है।"

वम्बर्ग के अनुसार, जो सामने है, उससे साफ है कि आने वाले वर्षों में इस तरह के हीटवेव के मानक होने की संभावना है।

एक हीटवेव, जैसा कि हमने उल्लेख किया है, एक विशेष तापमान स्तर को पार करने के बारे में नहीं है, बल्कि यह किसी स्थान विशेष के औसत तापमान से कितना अधिक है। उदाहरण के लिए, उत्तरी भारत में, एक हीटवेव 40 डिग्री सेल्सियस से ऊपर का तापमान वार करेगी, लेकिन स्विट्जरलैंड में यह 29 डिग्री सेल्सियस और उससे अधिक होगा। हालांकि, ऐसे स्थानों में जो नियमित रूप से उच्च तापमान झेलते हैं, लोग विभिन्न प्रकार के तंत्र विकसित करते हैं।

लेकिन समशीतोष्ण क्षेत्रों में ग्रीष्मकाल में लोग हीटवेव के लिए तैयार नहीं हैं। अकेले फ्रांस में अब तक हीटवेव से पांच मौतें हुई हैं।

विशेषज्ञों के अनुसार, भारत में, जहां गर्मी का मौसम आम है, यहां भी तापमान में और वृद्धि से कुछ क्षेत्र अच्छी तरह से कुप्रभावित हो सकते हैं।

अगर सीओ- 2 उत्सर्जन नही रूका तो अगले कुछ दशकों में भारत, पाकिस्तान और बांग्लादेश जानलेवा गर्मी की चपेट में आ जाएंगे, जैसा कि मैसाचुसेट्स इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी (MIT) के शोधकर्ताओं द्वारा 2017 का अध्ययन कहा गया है। अध्ययन में कहा गया है कि भारत-गंगा के मैदान में इसका प्रभाव विशेष रूप से गंभीर होगा।

Upto 37% of Indians were exposed to high temperatures (air temperature) of over 40 deg C for 10 hours or more in a day in 2019, up from 27.42% in 2018, according to satellite data. Data: GFS Temperature Estimates, GPWv4, MODIS (LPDAAC - NASA); Processed by Raj Bhagat Palanichamy using Google Earth Engine.

हीटवेव-जलवायु परिवर्तन लिंक

वैश्विक ग्रीनहाउस-गैस उत्सर्जन को निर्धारित करने के लिए कई शोध संस्थानों के बीच एक सहयोगात्मक प्रयास, ग्लोबल कार्बन प्रोजेक्ट से दिसंबर 2018 की रिपोर्ट के अनुसार, वैश्विक स्तर पर, सीओ-2 उत्सर्जन में वृद्धि जारी है और, 2016में 6 फीसदी की तुलना में 2017 में लगभग 7 फीसदी भारत से आया है।

ग्रीनहाउस गैस होने के नाते, सीओ-2 सूरज की गर्मी को ट्रैप करती है, जिससे भूमि की सतह का तापमान बढ़ जाता है। सामान्य तापमान की तुलना में ऊष्मा अधिक होती है। इसलिए, जलवायु परिवर्तन और हीटवेव के बीच का संबंध प्रत्यक्ष है।

वम्बर्ग कहते हैं, "हम जानते हैं कि सभी भूमि सतह क्षेत्रों - शायद ही कोई अपवाद हैं - पिछले 150 वर्षों में तापमान में वृद्धि देखी गई है। कुछ क्षेत्र तेजी से गर्म होते हैं और कुछ क्षेत्र धीमे-धीमे गर्म होते हैं।"

बढ़ते तापमान और हीटवेव के बीच यह संबंध भी एक रैखिक नहीं है। आईआईटी-गांधीनगर के मिश्रा ने कहा, "इसका क्या मतलब है: यदि तापमान में वृद्धि (वैश्विक) के बिना आपके पास 10 वर्षों में पांच हीटवेव हैं, तो आधा डिग्री सेल्सियस के तापमान में वृद्धि के साथ आप 10 वर्षों में सात हीटवेव होंगे। और अगर तापमान 1 डिग्री सेल्सियस बढ़ जाता है तो अचानक पांच साल में 20 हीटवेव हो सकती हैं।”

लेकिन वैश्विक तापमान परिवर्तनों का प्रभाव दुनिया भर में अलग-अलग होगा। और नमी का स्तर बढ़ना, इसमें एक कारक होगा।

दिल्ली में सेंटर फॉर एटमॉस्फेरिक साइंसेज, इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी के कृष्ण अचुतराव ने कहा, "हवा तापमान में हर डिग्री के लिए 7 फीसदी तक अधिक नमी पकड़ सकती है। इस प्रकार तटीय शहरों में, जहां हवा नम हो जाती है, तापमान में वृद्धि के साथ आर्द्रता का स्तर बढ़ जाएगा। जब नमी अधिक होती है, तो पसीना शरीर पर रहता है और कोई शीतलन प्रभाव नहीं होता है। इसीलिए मानसून के दौरान गर्मी अधिक दमनकारी लगती है।"

जबकि एक हीटवेव की घोषणा करते समय आईएमडी केवल तापमान वृद्धि को ध्यान में रखता है, वैज्ञानिकों ने एक गर्मी सूचकांक का सुझाव दिया जो तापमान वृद्धि और आर्द्रता दोनों को ध्यान में रखता है।

हीटवेव से नुकसान

तापमान में कितनी वृद्धि हुई है, कितनी देर और कितनी भूमि पर है, इस पर निर्भर करता है कि एक हीटवेव मानव जीवन को विभिन्न तरीकों से प्रभावित कर सकती है। आईआईटी-गांधीनगर के मिश्रा ने कहा, "आपके पास एक साल में तीव्र हीटवेव हो सकती है, लेकिन यह 2015 में (भारत में) देखा जा सकता है। लेकिन इस साल की हीटवेव देश के लगभग दो-तिहाई हिस्से को कवर करती है। इसलिए, अगर हीटवेव की तीव्रता समान है लेकिन कवर किया गया क्षेत्र दो से तीन गुना अधिक है, तो हम अधिक नुकसान की उम्मीद कर सकते हैं। ”

यदि इन हीटवेव्स के अनुकूल होने का कोई प्रयास नहीं किया जाता है, तो इससे ज्यादा मौतें हो सकती हैं; स्वास्थ्य पत्रिका पीएलओएस में प्रकाशित दुनिया भर के 20 क्षेत्रों के 2018 के एक अध्ययन के अनुसार, क्षेत्रों में भिन्नताएँ अलग-अलग होंगी। अध्ययन में कहा गया है कि मौतों में सबसे अधिक वृद्धि कोलंबिया में हुई, इसके बाद फिलीपींस और ब्राजील में हुई। भारत सहित उष्णकटिबंधीय क्षेत्रों में मौतों में वृद्धि देखी जाएगी। 

हीटवेव्स को प्री-टर्म बर्थ,प्रजनन क्षमता में कमी, मानसिक स्वास्थ्य के मुद्दों में वृद्धि, भारत में किसान आत्महत्या की दर में वृद्धि और क्रोनिक किडनी रोग से जोड़ा गया है।

India is among the top 20 countries in the world to have seen the most number of extreme weather events between 1998 and 2017, according to a 2019 report by a German non-profit that tracks climate risk.

जबकि गर्भवती महिलाएं, बुजुर्ग, और बच्चे विशेष रूप से संवेदनशील होते हैं। सेंटर फॉर एनवायरनमेंट एंड डेवलपमेंट, अशोका ट्रस्ट फॉर इकोलॉजी एंड एनवायरनमेंट या एटीआरईई में फेलो, शोएबल चक्रवर्ती ने कहा, "गर्मी का जोखिम आर्थिक वर्ग से संबंधित है। यह अनिवार्य रुप से उनसे जुड़ा है वो गरीब हैं और उन्हें गर्मी में काम करना होता है।"

जलवायु परिवर्तन के संदर्भ में इक्विटी का अध्ययन करने वाले चक्रवर्ती के अनुसार, अनौपचारिक क्षेत्र में काम करने वाले, विशेष रुप से संवेदनशील दिहाड़ी मजदूर, हीटवेव से सबसे अधिक प्रभावित होते हैं। 1991 में नवीनतम नमूना उपलब्ध राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण कार्यालय (एनएसएसओ) के आंकड़ों पर इंडियास्पेंड विश्लेषण के अनुसार, 1991 में अर्थव्यवस्था के उदारीकरण के बाद से 22 वर्षों में बनाई गई लगभग 61 मिलियन नौकरियों में, 92 फीसदी अनौपचारिक नौकरियां थीं।

इंडियास्पेंड के लिए डब्ल्यूआरआई के पलानीचामी द्वारा विश्लेषण के अनुसार, इस साल 37 फीसदी आबादी, 10 घंटे से ज्यादा या एक दिन के लिए 40 डिग्री सेल्सियस से अधिक तापमान के संपर्क में थी, जो कि पिछले चार वर्षों में सबसे ज्यादा है।

2016 में, यह संख्या 31.79 फीसदी थी, जो 2017 में 34.19 फीसदी हो गई और 2018 में गिरकर 27.42 फीसदी हो गई।

शिकागो विश्वविद्यालय के एनर्जी पॉलिसी इंस्ट्यूट में चल रहे भारत-केंद्रित अध्ययन के प्रारंभिक परिणामों के अनुसार, हीटवेव उत्पादकता में भी कमी लाती है। तापमान में प्रत्येक गिरावट सी वृद्धि के साथ उत्पादकता 2-4 फीसदी घट जाती है।

World Meteorological Organization.

वायु प्रदूषण और हीटवेव

अचूताराव द्वारा सह-अध्ययन के अनुसार, भारत को जलवायु मॉडल के अनुमान के मुकाबले कम गर्मी का सामना करना पड़ रहा है।

जैसा कि जलवायु परिवर्तन होता है, उम्मीद है कि चरम तापमान - एक क्षेत्र में प्रत्येक वर्ष के सबसे गर्म दिन पर अधिकतम तापमान - बढ़ता रहेगा।

आईआईटी-दिल्ली के अचुतराओ ने कहा, "अमेरिका, रूस और यूरोप में हुए सभी अध्ययनों में ऐसा हुआ है, लेकिन यह भारत में नहीं हुआ है।”

वैज्ञानिकों को संदेह है कि इससे दो कारकों का पता लगाया जा सकता है: वायु प्रदूषण और सिंचाई। अचुतराव ने कहा,यदि भारत को अपनी वायु को साफ करना है, तो इस तरह सूर्य के प्रकाश को अवरुद्ध करने वाले तत्वों को मिटाना है, गर्मी के स्तर के ऊपर जाने की संभावना है। जो अस्पष्ट है, वह ठीक यही है कि एक बार प्रदूषण को तस्वीर से बाहर निकालने के बाद हीटवेव कितनी बढ़ जाएगी।

वायु प्रदूषण सिर्फ गैसों की उपस्थिति के कारण नहीं . बल्कि एरोसोल (हवा में ठोस या तरल कण) के कारण होता है। मई 2019 में एक इंडियास्पेंड की रिपोर्ट में बताया गया है कि कुछ एयरोसोल्स का वार्मिंग प्रभाव होता है, इसका मतलब यह है कि स्थानीय प्रदूषण, नमी के स्तर और सतह के जल निकायों की प्रकृति के आधार पर, विभिन्न क्षेत्रों में या तो गर्मी के स्तर में वृद्धि या गिरावट का अनुभव होगा, जब प्रदूषण साफ हो जाएगा।

सिंचाई से भूमि पर शीतलन प्रभाव पड़ता है। लेकिन यह प्रभाव छोटा और स्थानीय है। आईआईटी-गांधीनगर के मिश्रा ने कहा, " जब गर्मी पड़ती है और उस समय तक अधिकांश फसलें कट चुकी होती हैं।"

आगे बढ़ने का रास्ता

भविष्य की तैयारी में दो चरण शामिल होंगे: शमन और अनुकूलन। अचुताराव ने कहा, "भविष्य में हीटवेव को कम करने के संदर्भ में, एकमात्र तरीका सीओ-2 उत्सर्जन को नियंत्रित करना है।" इसमें वैश्विक प्रयास शामिल होगा।

सीओ-2 के उत्सर्जन को कम करने और मौजूदा वनों की सुरक्षा के लिए नवीकरणीय ऊर्जा पर ध्यान केंद्रित करना अन्य महत्वपूर्ण शमन उपाय हैं। अनुकूलन में अधिक वृक्षों के आवरण पर ध्यान देने के साथ बेहतर शहरी नियोजन शामिल होगा और सतह के जल निकायों को बढ़ाना होगा जो एक स्थानीय शीतलन प्रभाव रखते हैं।

एटीआरईई से चक्रवर्ती कहते हैं, "जलवायु परिवर्तन के लिए एक एकीकृत दृष्टिकोण और कम से कम देश में गर्मी और शीतलन के प्रबंधन की आवश्यकता है। इन सभी उपायों के बाद भी, हीटवेव होगी, लेकिन उनका प्रभाव कम हो जाएगा"।

(शेट्टी इंडियास्पेंड के साथ रिपोर्टिंग फेलो हैं।)

( यह लेख मूलत: अंग्रेजी में 10 अगस्त 2019 को IndiaSpend.com पर प्रकाशित हुआ है। )

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