हिमाचल प्रदेश में बुज़ुर्गों का सहारा हैं एमएमयू

बिलासपुर, हमीरपुर, मनाली, शिमला और सोलन: 72 साल की रिनझिन हिमाचल प्रदेश के ब़ड़ोग गांव की पहाड़ी पर बने एक छोटे से कमरे में रहती है जिसमें बस किसी तरह एक बेड आ पाता है। रिनझिन एक कप चाय पीने के बाद अपने पति के साथ एक नीले रंग की बस की तरफ़ बढ़ना शुरु कर देती है, जो पहाड़ी के नीचे 300 मीटर की दूरी पर खड़ी है।

रिनझिन, वहां पास में बने टिन शेड में बैठने की जगह तलाश करती है। इसी बीच उसका पति बातिर सिंह (73) वहीं लगभग 15 लोगों की लाइन में लग जाता है. जिसमें ज़्यादातर बुज़ुर्ग लोग लगे हैं। ये लोग डॉक्टर से मिलने के लिए अपनी बारी का इंतेज़ार कर रहे हैं। ये सिलसिला पिछले दो साल से चल रहा है। 

ये ना तो प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र (पीएचसी) है और ना ही कोई अस्पताल। ये मोबाइल हैल्थकेयर यूनिट है, जिसे एक बस में सेट किया गया है। इस बस में एक डॉक्टर, एक फ़ार्मेसिस्ट, एक लैब टेकनीशियन और एक फ़िज़ियोथेरेपिस्ट मौजूद होता है। 

रिनझिन के गांव में हर गुरुवार‍ को आने वाली मोबाइल हेल्‍थकेयर यूनिट को हेल्पएज इंडिया संचालित करता है। हेल्‍पएज इंडिया पूरे राज्‍य में ऐसी 11 यूनिट  चलाता है। यहां मरीज़ों को मुफ्त में डॉक्‍टरी सलाह, ज़रूरी दवाएं, कुछ टेस्‍ट और फीजियोथेरेपी की सुविधा दी जाती है। राज्‍य में इस तरह की 26 यूनिट काम कर रही हैं। सभी को गैर लाभकारी संगठन चलाते हैं। कुछ को थोड़ी-बहुत आर्थिक मदद सरकार से है।   

रिनझिन और उसके पति बातिर सिंह को जोड़ों और पीठ में दर्द की शिकायत रहती है। अस्पताल यहां से एक घंटे की दूरी पर है, जहां इनके लिए जाना मुमकिन नहीं है। बातिर सिंह ने बताया, “इस मोबाइल सेवा से मुझे और मेरी पत्नी को बहुत फ़ायदा हुआ है।” 

जंगल से होकर जाने वाले संकरे रास्तों की वजह से हिमाचल प्रदेश के पहाड़ी इलाक़ों में कम दूरी को तय करने में भी काफ़ी वक्त लग जाता है। बीमार या बुज़ुर्गों के लिए अक्सर प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र तक जाना काफ़ी मुश्किल होता है। कभी अगर वो वहां जाते भी हैं तो या तो डॉक्टर नहीं मिलता या फिर सुविधाएं नहीं होतीं।

राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन (एनएचएम) ने दूरदराज़ के इलाकों के लिए मोबाइल मेडिकल यूनिट (एमएमयू) की शुरुआत की है। एनचएम की गाइडलाइंस के अनुसार एक ज़िले में कम से कम एक और अधिक से अधिक पांच एमएमयू होने चाहिए।

हालांकि उत्‍तर भारत के पहाड़ी और दूरदराज़ के इलाकों में एमएमयू की ख़ासतौर पर ज़रूरत है, लेकिन यहां बहुत कम एमएमयू हैं। सरकार के मार्च, 2018 के ताज़ा आंकड़ों के अनुसार देश भर में कुल 1,427 एमएमयू हैं।  इनमें से एक तिहाई (415) तमिलनाडु में, राजस्‍थान में 206, मध्‍य प्रदेश में 144 और असम में 130 एमएमयू हैं। हैरानी की बात तो यह है कि देश की सबसे बड़ी आबादी वाले उत्‍तर प्रदेश, पहाड़ी राज्‍य उत्‍तराखंड और त्रिपुरा में एक भी एमएमयू नहीं है। अरुणाचल प्रदेश और नागालैंड में क्रमश: 16 और 11 एमएमयू हैं।

हिमाचल प्रदेश के 12 में से नौ ज़िलों में 26 ऐसी यूनिट हैं। इनमें से केवल 15 को ही एमएमयू का दर्जा मिला हुआ है। हेल्‍पएज इंडिया की 11 यूनिट, क्लीनिकल एस्टैबलिशमेंट एक्ट के तहत ‘क्लीनिक’ के रूप में पंजीकृत हैं।

शिमला के कालीहट्टी में हेल्पेज इंडिया की एक मोबाइल मेडिकल यूनिट में 25 अक्टूबर, 2019 को डॉक्टर दिविंदर सिंह बल्लुरिया चेक-अप करते हुए।

हमने अक्‍टूबर, 2019 में पांच ज़िलों के दौरे में पाया कि एमएमयू में नियमित रूप से मरीज़ आ रहे हैं। यहां आने वाले लोगों ने बताया कि वे अपने घर के इतने पास मेडिकल  चेकअप और दवाइयों की सुविधा पा कर खुश हैं। कुछ ऐसे भी लोग मिले, जो दूरदराज़ के इलाकों से एमएमयू में चेकअप के लिए आते हैं। उनका कहना है कि उनके घर के पास के पीएचसी के मुक़ाबले, एमएमयू अधिक भरोसेमंद है।  

हालांकि, सुविधाओं के मामले में हमने एमएमयू में विभिन्नता पाई। शायद उसकी वजह उन्हें मिलने वाली फंडिंग थी। कुछ में तो एडवांस डायग्नोस्टिक इक्‍विपमेंट तक हैं जबकि कुछ में एक काबिल डॉक्टर तक नहीं है। 

पब्लिक हेल्‍थ सेंटर

इंडियास्‍पेंड की 23 मई, 2018 की एक रिपोर्ट में बताया गया था कि हेल्‍थकेयर उपलब्‍ध कराने और इसकी गुणवत्‍ता के मामले में भारत का स्‍थान 195 देशों में 145वां था। रिपोर्ट के अनुसार पीएचसी, जो डॉक्टर्स तक पहुंचने के लिए पब्लिक हेल्‍थकेयर सिस्‍टम का पहला पड़ाव है, मरीज़ों के बोझ के तले दबे हैं।  

वर्ष 2018 में 32,387 लोगों पर एक पीएचसी था। हालांकि, इंडियन पब्लिक हैल्थ स्टैंडर्ड ने मैदानी भागों में 30,000 लोगों के लिए एक पीएचसी और हिमाचल प्रदेश जैसे पहाड़ी इलाकों के लिए 20,000 लोगों पर एक पीएचसी की सिफ़ारिश की थी। 

हिमाचल प्रदेश में, पीएचसी का औसत देश के औसत से ज़्यादा है। यहां हर 11,000 लोगों पर एक पीएचसी है, लेकिन इन पीएचसी में अक्सर कर्मचारियों की कमी और इनके मोटर रोड से नहीं जुड़े होने के कारण साधारण और इमरजेंसी मेडिकल सेवाओं पर असर पड़ता है।

जुलाई 2019 में लोक सभा में एक सवाल के जवाब में स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय ने बताया कि हिमाचल प्रदेश के 18.6% पीएचसी में डॉक्‍टर नहीं थे, 84.7% के पास लेबोरेटरी टेक्नीशियन और 45.3% के पास कोई फार्मेसिस्‍ट नहीं था।

लोकसभा में पूछे गए इसी सवाल के जवाब में बताया गया था कि पूरे भारत में करीब एक तिहाई (34.5%) पीएचसी में लैब टेक्निशियन और 15.6% में फार्मेसिस्‍ट नहीं थे।

मोबाइल मे़डिकल यूनिट की फ़ंडिंग

शिमला के कालीहट्टी में एक एमएमयू में फर्मासिस्‍ट अमित कैनथला, 25 अक्टूबर 2019 को दवाएं बांटते हुए।

एनएचएम की गाइडलाइंस के अनुसार सरकार, एमएमयू को पूरी तरह से अपने ख़र्च पर चला सकती है या इसके बनाने पर ख़र्च में आने वाली रकम वहन कर सकती है। सरकार को आवश्‍यक रूप से दवाएं और ज़रूरत के अन्‍य सामान एमएमयू को उपलब्ध कराने चाहिए।

हिमाचल प्रदेश में सभी 26 एमएमयू ग़ैर लाभकारी संस्थाएं चला रही हैं।

हमीरपुर स्थित एनजीओ प्रयास सोसायटी, चार ज़िलों हमीरपुर, ऊना, बिलासपुर और मंडी में 15 एमएमयू चला रहा है। 17 इकाइयों के लिए गाड़ी और अन्य सामानों का खर्च स्थानीय सांसद अनुराग ठाकुर की सांसद निधि से पूरा होता है। उल्लेखनीय है कि अपने क्षेत्र में विकास के लिए हर सांसद को हर साल सांसद निधि के रूप में 5 करोड़ रुपए मिलते हैं।

तीन इकाइयों के संचालन का ख़र्च एनएचएम उठाता है। कॉरपोरेट सोशल रिस्पॉन्सिबिलिटी (सीएसआर) के तहत चार-पांच कंपनियां, 12 एमएमयू  का खर्च उठाती हैं। दो एमएमयू अभी चालू हालत में नहीं हैं।

प्रयास सोसायटी के एमएमयू कार्यक्रम के प्रभारी डॉ. विकास सिंह ने इंडियास्पेंड  को बताया कि एक एमएमयू का सालाना बजट लगभग 12 लाख रुपये होता है। यह बजट, 28 लाख रुपये प्रति यूनिट की एनएचएम की सिफ़ारिशों के मुकाबले 57% कम है। हमीरपुर ज़िले की मुख्य चिकित्सा अधिकारी अर्चना सोनी ने बताया कि सरकार ने वित्त वर्ष 2018-19 में तीन इकाइयों के लिए कुल 10.7 लाख रुपये दिए। ये रक़म, प्रयास के बजट के अनुसार इन इकाइयों को चलाने के लिए आवश्यक राशि की एक तिहाई से भी कम है।

एनएचएम की सिफारिशों के मुताबिक, एमएमयू में एक इलेक्ट्रोकार्डियोग्राम मशीन, एक रेफ्रीजरेटर और एक स्टेरेलाइइज़र होना चाहिए। प्रयास एमएमयू में ये सुविधाएं नहीं हैं।

यह पूछे जाने पर कि क्या एनएचएम मापदंडों के अनुसार एमएमयू के कामकाज के लिए आवंटित धन पर्याप्त है, राज्य के एनएचएम अधिकारियों ने कहा कि वे  इस पर कोई टिप्पणी नहीं करना चाहते।

कम बजट पर एमएमयू चलाने और पहाड़ी इलाकों में मेडिसिन और बैचलर्स ऑफ सर्जरी (एमएमबीबीएस) की डिग्री वाले डॉक्टरों की कमी के कारण प्रयास, एमबीबीएस डिग्री वाले डॉक्टर्स की बजाय, आयुर्वेदिक, यूनानी, सिद्ध और होम्योपैथी (आयुष) डॉक्टरों की सेवाएं लेता है। इंडियन मेडिकल काउंसिल एक्ट के अनुसार, ये डॉक्टर आधुनिक चिकित्सा पद्धति की प्रैक्टिस के क़ाबिल नहीं होते हैं।

प्रयास सोसायटी में मोबाइल मेडिकल यूनिट्स के प्रमुख  डॉ. विकास सिंह का कहना है कि मौजूदा बजट में सभी इकाइयों में एमबीबीएस डॉक्टरों को नियुक्त करना संभव नहीं है।

विकास सिंह ने कहा, "कोई भी एमबीबीएस डॉक्टर एक लाख रुपये महीना से कम की तनख़्वाह पर काम करने को तैयार नहीं होता। इसलिए सभी इकाइयों में एमबीबीएस डॉक्टर को रखा जाना व्यावहारिक रूप से संभव नहीं है। हमने इन इकाइयों के कामकाज की देखरेख के लिए हर ज़िले में एक एमबीबीएस डॉक्टर को नियुक्त किया है।

हेल्पएज इंडिया के हिमाचल प्रदेश प्रमुख राजेश कुमार ने कहा, ''यह तनख़्वाह  80 या 90 हज़ार रुपये महीना या इससे भी अधिक हो सकती है, अगर वे आदिवासी या दूरदराज़ के इलाक़ों में तैनात किए जाते हैं।”

हेलपएज इंडिया, देश के 24 राज्यों में 144 और हिमाचल प्रदेश में सात ज़िलों में अपने 11 यूनिट चलाता है।

हेल्पएज इंडिया का बजट, प्रयास सोसायटी के मुक़ाबले दोगुना है, लेकिन फिर भी ये एनएचएम की सिफारिश के मुताबिक सभी सुविधाएं नहीं देता है। ये संस्‍था हर साल 30 लाख रुपये प्रति यूनिट खर्च करती है। इसमें एमबीबीएस डॉक्टर, एक पंजीकृत फार्मासिस्ट, एक लैब टैकनीशियन और एक ड्राइवर की तनख़्वाह शामिल होती है। इन इकाइयों में बुनियादी दवाएं, ब्लडप्रेशर और ब्लडशुगर की जांच की सुविधाएं होती हैं।

प्रयास द्वारा संचालित इकाइयों में हेल्पएज इंडिया की तुलना में मरीज़ों की ज़्यादा पैथोलॉजिकल जांच की सुविधा होती है। इनमें कोलेस्ट्रॉल, लिवर और किडनी की जांच शामिल हैं।

कुछ एमएमयू ऐसे हैं जिनका बजट बहुत अधिक है। उदाहरण के तौर पर सोलन में हेल्पएज एमएमयू  का बजट  तीन साल के लिए 1.3 करोड़ रुपये का है। जो सालाना 45 लाख रुपये बैठता है। इसमें मूत्र और ख़ून से सम्बंधित अधिकतर जांच की जा सकती है। इसमें फीज़ियोथेरेपी की सुविधा भी मौजूद है। ये वही यूनिट है, जहां रिनझिन और उसका पति इलाज कराते हैं

इलाज के लिए नियमित एमएमयू की ज़रूरत

हिमाचल प्रदेश के ताकेरा गांव के 86 वर्षीय गुलाबो राम को डायबिटीज़ है। प्रयास की एक मोबाइल मेडिकल यूनिट उनके गांव में आई और उनका चेकअप और सात दिन के लिए दवाएं मुफ़्त दीं। वह चाहते हैं कि यूनिट बार-बार आए, ताकि उन्हें अपनी दवा लाने के लिए हर महीने 2-3 बार तीन किमी दूर स्थित अस्पताल ना जाना पड़े।

प्रयास की एक टीम ख़ून जांच करने के उपकरणों के साथ 22 अक्टूबर, 2019 को, बिलासपुर ज़िले के ताकेरा गांव के आंगनवाड़ी केंद्र पहुंची। उस दिन एमएमयू में 44 मरीज़ आए थे।

ताकेरा शिविर की प्रभारी डॉ. अंकिता शर्मा ने बताया, “हम गांव के बीच में या सामुदायिक भवनों, जैसे आंगनवाड़ी केंद्र या स्कूलों में शिविर लगाने की कोशिश करते हैं। मरीज़ यहां आसानी से पहुंच सकते हैं और ये उनके लिए सुविधाजनक भी है।”

इस तरह की इकाइयां, 86 वर्षीय गुलाबो राम जैसे अकेले रहने वाले बुजुर्गों के लिए विशेष रूप से सहायक हो सकती हैं।गुलाबो राम 15 साल से डायबिटिक हैं। उनकी पत्नी का 20 साल पहले निधन हो गया। उन्होंने बताया कि उनकी बेटियां शादीशुदा हैं और दूर रहती हैं। बेटे के साथ उनकी बातचीत बंद है। उन्होंने कहा,  “मुझे हर महीने में दो से तीन बार, अकेले 3 किमी दूर अस्पताल जाना पड़ता है। जो मेरे लिए मुश्किल है।” गुलाबो राम ने बताया कि वहां एक बार में केवल सात या 14 दिनों के लिए ही मुफ्त दवा दी जाती है।

प्रयास की टीम ने गुलाबो राम को सात दिन की दवाएं दीं। इसके बाद उन्‍हें अस्पताल जाना होगा। गुलाबो राम ने कहा कि वह चाहते थे कि मोबाइल यूनिट उनके गांव में बार-बार आए ताकि वो अस्पताल जाने से बच सकें।

प्रयास की एमएमयू इस गांव का दौरा, फिर से डेढ़ से दो महीने बाद करेगी। इसके बाद टीम घुमारवीं विधानसभा क्षेत्र के सभी बचे गांवों में जाएगी। टीम के डॉक्टरों ने कहा कि एक गांव दोबारा आने में 4-6 महीने लग सकते हैं।

एनएचएम की  गाइडलाइंस के अनुसार एमएमयू को महीने में कम से कम एक बार एक इलाके का दौरा करना चाहिए। वैसे क्षेत्रों को प्राथमिकता देनी चाहिए जहां  सुविधाएं ना के बराबर हैं।

हिमाचल प्रदेश के सोलन ज़िले के बड़ोग में एक मोबाइल हेल्थकेयर यूनिट तक पहुंचने के लिए 70 वर्षीय निर्मला देवी 13 किमी चल कर आईं हैं। उनको शिविर सरकारी पीएचसी की तुलना में अधिक भरोसेमंद लगता है। पीएचसी में डॉक्‍टर कुछ ही दिन आते हैं और उनका भी कोई समय तय नहीं होता।

हेल्पएज इंडिया, ऐसे गांवों की पहचान करता है, जो स्वास्थ्य सुविधाओं से वंचित हों और पिछड़े हों। हेल्पएज इंडिया की सोलन इकाई के सामाजिक सुरक्षा अधिकारी मनोज वर्मा ने कहा, “एमएमयू लगातार प्रत्येक सप्ताह में 5-12 गांवों का दौरा एक तय दिन करते हैं। इससे लोगों को हम पर भरोसा पैदा हो जाता है।”

जिस दिन इंडियास्पेंड ने सोलन ज़िले के बड़ोग में हेल्पएज इंडिया इकाई का दौरा किया उस दिन क़रीब 70% मरीज़ वहां फॉलो-अप के लिए आए थे। मरीज़ों ने बताया कि वे एक साल से अधिक समय से शिविर में आ रहे हैं।  

डायबीटिज़ से पीड़ित 70 साल की निर्मला देवी इलाज के लिए दो साल से नियमित रूप से यहां आ रही हैं। भले ही उनका गांव कैम्प से 13 किमी दूर है और पीएचसी उनके घर से 1 किमी दूर है। उन्होंने इंडियास्पेंड को बताया, "पीएचसी में डॉक्टर बुधवार को ही होते हैं और वह भी कुछ ही घंटों के लिए, जिसका समय भी तय नहीं है। यहां आना पीएचसी तक जाने और बिना किसी जांच और दवा के वापस लौटने से बेहतर है।"

प्रयास सोसाइटी की सभी मोबाइल मेडिकल यूनिट में एक प्रयोगशाला किट होती है जो एक सूटकेस में फिट हो जाती है। इसे कर्मचारियों को दूरदराज़ के गांवों तक ले जाने में भी आसानी होती है।

सुदूर ऊंचाई वाले ज़िलों में कम एमएमयू

हिमाचल के 26 एमएमयू  में से 22 निचले इलाकों में हैं। हेल्पएज इंडिया के चार एमएमयू ज़्यादा ऊंचाई पर स्थित, किन्नौर और कुल्लू ज़िलों में हैं।

हेल्पएज इंडिया के राजेश कुमार ने कहा, "अधिक ऊंचाई वाले क्षेत्रों में एमएमयू का संचालन करना अधिक कठिन है। वहां कर्मचारियों को ढूंढ़ना मुश्किल है, वहां सड़कों का पता लगाना और उनपर चलना मुश्किल होता है। सर्दियों के कुछ दिनों में तो हमें अपने ऑपरेशन को पूरी तरह से रोकना पड़ता है।"

Source: Seasonal and annual rainfall trends in Himachal Pradesh during 1951-2005

राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन के हिमाचल प्रदेश के मिशन डायरेक्टर निपुण जिंदल ने इंडियास्पेंड को बताया कि ज़्यादा ऊंचाई वाले स्थानों पर जहां मरीज़ों और बुज़ुर्गों का पीएचसी तक पहुंचना मुश्किल होता है, सरकार 2020 तक अपनी एमएमयू सर्विस शुरु कर देगी। राज्य की एनएचएम टीम 13 वर्षों से ऐसी इकाइयों को चालू करने की कोशिश कर रही है। लेकिन इसके लिए जारी किए गए टेंडर्स से कोई ख़ास नतीजे नहीं निकले हैं। उन्होंने कहा, "हालांकि, हम उम्मीद करते हैें कि नई जीवन धारा योजना के तहत राज्य के सभी ज़िलों में जनवरी 2020 तक, हमारे मोबाइल स्वास्थ्य और कल्याण केंद्र चालू हो जाएंगे।” राज्य की इस योजना का उद्देश्य प्रत्येक ज़िले में मोबाइल स्वास्थ्य और कल्याण केंद्रों की स्थापना करना है ताकि मुफ्त दवाएं बांटी जा सकें और 50 प्रकार की शारीरिक जांच मुहैया कराई जा सके।  

जिंदल ने कहा कि इस योजना के तहत स्थापित मोबाइल इकाइयों में एक एमबीबीएस डॉक्टर होगा। योजना एनएचएम के दिशा-निर्देशों का पालन करेगी। हालांकि, उन्होंने कहा कि सरकार का ज़ोर पीएचसी में सुधार लाने पर है। मोबाइल मेडिकल यूनिट एक दूसरे स्‍तर की सेवा है जो हम लोगों को प्रदान कर सकते हैं। हमारा प्राथमिक उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र (पीएचसी) अच्छी तरह सुविधाओं से लैस हों और काम करें।

जब तक यह उद्देश्य पूरा नहीं हो जाता, तब तक बातिर सिंह बड़ोग के एमएमयू के भरोसे हैं जहां वो हर गुरुवार को जाते हैं। बातिर, 1970 से एक दिहाड़ी मज़दूर थे। साल 2000 में एक असफल सर्जरी के बाद संक्रमण के कारण उन्हें चार और सर्जरी करानी पड़ी। इसके  बाद उनका काम-धंधा छूट गया। बातिर ने कहा, "मेरे पास एक घंटे की दूरी पर स्थित अस्पताल जाने या काम करने की अब ताक़त नहीं बची है। मुझे खुशी है कि मुझे इस तरह की सुविधा हमारे घर के पास मिल जाती  है।"

(श्रेया, इंडियास्पेंड में डेटा एनालिस्ट हैं।)

(ये रिपोर्ट मूलत: अंग्रेज़ी में 18 नवंबर 2019 को IndiaSpend पर प्रकाशित हुई है।)

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बिलासपुर, हमीरपुर, मनाली, शिमला और सोलन: 72 साल की रिनझिन हिमाचल प्रदेश के ब़ड़ोग गांव की पहाड़ी पर बने एक छोटे से कमरे में रहती है जिसमें बस किसी तरह एक बेड आ पाता है। रिनझिन एक कप चाय पीने के बाद अपने पति के साथ एक नीले रंग की बस की तरफ़ बढ़ना शुरु कर देती है, जो पहाड़ी के नीचे 300 मीटर की दूरी पर खड़ी है।

रिनझिन, वहां पास में बने टिन शेड में बैठने की जगह तलाश करती है। इसी बीच उसका पति बातिर सिंह (73) वहीं लगभग 15 लोगों की लाइन में लग जाता है. जिसमें ज़्यादातर बुज़ुर्ग लोग लगे हैं। ये लोग डॉक्टर से मिलने के लिए अपनी बारी का इंतेज़ार कर रहे हैं। ये सिलसिला पिछले दो साल से चल रहा है। 

ये ना तो प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र (पीएचसी) है और ना ही कोई अस्पताल। ये मोबाइल हैल्थकेयर यूनिट है, जिसे एक बस में सेट किया गया है। इस बस में एक डॉक्टर, एक फ़ार्मेसिस्ट, एक लैब टेकनीशियन और एक फ़िज़ियोथेरेपिस्ट मौजूद होता है। 

रिनझिन के गांव में हर गुरुवार‍ को आने वाली मोबाइल हेल्‍थकेयर यूनिट को हेल्पएज इंडिया संचालित करता है। हेल्‍पएज इंडिया पूरे राज्‍य में ऐसी 11 यूनिट  चलाता है। यहां मरीज़ों को मुफ्त में डॉक्‍टरी सलाह, ज़रूरी दवाएं, कुछ टेस्‍ट और फीजियोथेरेपी की सुविधा दी जाती है। राज्‍य में इस तरह की 26 यूनिट काम कर रही हैं। सभी को गैर लाभकारी संगठन चलाते हैं। कुछ को थोड़ी-बहुत आर्थिक मदद सरकार से है।   

रिनझिन और उसके पति बातिर सिंह को जोड़ों और पीठ में दर्द की शिकायत रहती है। अस्पताल यहां से एक घंटे की दूरी पर है, जहां इनके लिए जाना मुमकिन नहीं है। बातिर सिंह ने बताया, “इस मोबाइल सेवा से मुझे और मेरी पत्नी को बहुत फ़ायदा हुआ है।” 

जंगल से होकर जाने वाले संकरे रास्तों की वजह से हिमाचल प्रदेश के पहाड़ी इलाक़ों में कम दूरी को तय करने में भी काफ़ी वक्त लग जाता है। बीमार या बुज़ुर्गों के लिए अक्सर प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र तक जाना काफ़ी मुश्किल होता है। कभी अगर वो वहां जाते भी हैं तो या तो डॉक्टर नहीं मिलता या फिर सुविधाएं नहीं होतीं।

राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन (एनएचएम) ने दूरदराज़ के इलाकों के लिए मोबाइल मेडिकल यूनिट (एमएमयू) की शुरुआत की है। एनचएम की गाइडलाइंस के अनुसार एक ज़िले में कम से कम एक और अधिक से अधिक पांच एमएमयू होने चाहिए।

हालांकि उत्‍तर भारत के पहाड़ी और दूरदराज़ के इलाकों में एमएमयू की ख़ासतौर पर ज़रूरत है, लेकिन यहां बहुत कम एमएमयू हैं। सरकार के मार्च, 2018 के ताज़ा आंकड़ों के अनुसार देश भर में कुल 1,427 एमएमयू हैं।  इनमें से एक तिहाई (415) तमिलनाडु में, राजस्‍थान में 206, मध्‍य प्रदेश में 144 और असम में 130 एमएमयू हैं। हैरानी की बात तो यह है कि देश की सबसे बड़ी आबादी वाले उत्‍तर प्रदेश, पहाड़ी राज्‍य उत्‍तराखंड और त्रिपुरा में एक भी एमएमयू नहीं है। अरुणाचल प्रदेश और नागालैंड में क्रमश: 16 और 11 एमएमयू हैं।

हिमाचल प्रदेश के 12 में से नौ ज़िलों में 26 ऐसी यूनिट हैं। इनमें से केवल 15 को ही एमएमयू का दर्जा मिला हुआ है। हेल्‍पएज इंडिया की 11 यूनिट, क्लीनिकल एस्टैबलिशमेंट एक्ट के तहत ‘क्लीनिक’ के रूप में पंजीकृत हैं।

शिमला के कालीहट्टी में हेल्पेज इंडिया की एक मोबाइल मेडिकल यूनिट में 25 अक्टूबर, 2019 को डॉक्टर दिविंदर सिंह बल्लुरिया चेक-अप करते हुए।

हमने अक्‍टूबर, 2019 में पांच ज़िलों के दौरे में पाया कि एमएमयू में नियमित रूप से मरीज़ आ रहे हैं। यहां आने वाले लोगों ने बताया कि वे अपने घर के इतने पास मेडिकल  चेकअप और दवाइयों की सुविधा पा कर खुश हैं। कुछ ऐसे भी लोग मिले, जो दूरदराज़ के इलाकों से एमएमयू में चेकअप के लिए आते हैं। उनका कहना है कि उनके घर के पास के पीएचसी के मुक़ाबले, एमएमयू अधिक भरोसेमंद है।  

हालांकि, सुविधाओं के मामले में हमने एमएमयू में विभिन्नता पाई। शायद उसकी वजह उन्हें मिलने वाली फंडिंग थी। कुछ में तो एडवांस डायग्नोस्टिक इक्‍विपमेंट तक हैं जबकि कुछ में एक काबिल डॉक्टर तक नहीं है। 

पब्लिक हेल्‍थ सेंटर

इंडियास्‍पेंड की 23 मई, 2018 की एक रिपोर्ट में बताया गया था कि हेल्‍थकेयर उपलब्‍ध कराने और इसकी गुणवत्‍ता के मामले में भारत का स्‍थान 195 देशों में 145वां था। रिपोर्ट के अनुसार पीएचसी, जो डॉक्टर्स तक पहुंचने के लिए पब्लिक हेल्‍थकेयर सिस्‍टम का पहला पड़ाव है, मरीज़ों के बोझ के तले दबे हैं।  

वर्ष 2018 में 32,387 लोगों पर एक पीएचसी था। हालांकि, इंडियन पब्लिक हैल्थ स्टैंडर्ड ने मैदानी भागों में 30,000 लोगों के लिए एक पीएचसी और हिमाचल प्रदेश जैसे पहाड़ी इलाकों के लिए 20,000 लोगों पर एक पीएचसी की सिफ़ारिश की थी। 

हिमाचल प्रदेश में, पीएचसी का औसत देश के औसत से ज़्यादा है। यहां हर 11,000 लोगों पर एक पीएचसी है, लेकिन इन पीएचसी में अक्सर कर्मचारियों की कमी और इनके मोटर रोड से नहीं जुड़े होने के कारण साधारण और इमरजेंसी मेडिकल सेवाओं पर असर पड़ता है।

जुलाई 2019 में लोक सभा में एक सवाल के जवाब में स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय ने बताया कि हिमाचल प्रदेश के 18.6% पीएचसी में डॉक्‍टर नहीं थे, 84.7% के पास लेबोरेटरी टेक्नीशियन और 45.3% के पास कोई फार्मेसिस्‍ट नहीं था।

लोकसभा में पूछे गए इसी सवाल के जवाब में बताया गया था कि पूरे भारत में करीब एक तिहाई (34.5%) पीएचसी में लैब टेक्निशियन और 15.6% में फार्मेसिस्‍ट नहीं थे।

मोबाइल मे़डिकल यूनिट की फ़ंडिंग

शिमला के कालीहट्टी में एक एमएमयू में फर्मासिस्‍ट अमित कैनथला, 25 अक्टूबर 2019 को दवाएं बांटते हुए।

एनएचएम की गाइडलाइंस के अनुसार सरकार, एमएमयू को पूरी तरह से अपने ख़र्च पर चला सकती है या इसके बनाने पर ख़र्च में आने वाली रकम वहन कर सकती है। सरकार को आवश्‍यक रूप से दवाएं और ज़रूरत के अन्‍य सामान एमएमयू को उपलब्ध कराने चाहिए।

हिमाचल प्रदेश में सभी 26 एमएमयू ग़ैर लाभकारी संस्थाएं चला रही हैं।

हमीरपुर स्थित एनजीओ प्रयास सोसायटी, चार ज़िलों हमीरपुर, ऊना, बिलासपुर और मंडी में 15 एमएमयू चला रहा है। 17 इकाइयों के लिए गाड़ी और अन्य सामानों का खर्च स्थानीय सांसद अनुराग ठाकुर की सांसद निधि से पूरा होता है। उल्लेखनीय है कि अपने क्षेत्र में विकास के लिए हर सांसद को हर साल सांसद निधि के रूप में 5 करोड़ रुपए मिलते हैं।

तीन इकाइयों के संचालन का ख़र्च एनएचएम उठाता है। कॉरपोरेट सोशल रिस्पॉन्सिबिलिटी (सीएसआर) के तहत चार-पांच कंपनियां, 12 एमएमयू  का खर्च उठाती हैं। दो एमएमयू अभी चालू हालत में नहीं हैं।

प्रयास सोसायटी के एमएमयू कार्यक्रम के प्रभारी डॉ. विकास सिंह ने इंडियास्पेंड  को बताया कि एक एमएमयू का सालाना बजट लगभग 12 लाख रुपये होता है। यह बजट, 28 लाख रुपये प्रति यूनिट की एनएचएम की सिफ़ारिशों के मुकाबले 57% कम है। हमीरपुर ज़िले की मुख्य चिकित्सा अधिकारी अर्चना सोनी ने बताया कि सरकार ने वित्त वर्ष 2018-19 में तीन इकाइयों के लिए कुल 10.7 लाख रुपये दिए। ये रक़म, प्रयास के बजट के अनुसार इन इकाइयों को चलाने के लिए आवश्यक राशि की एक तिहाई से भी कम है।

एनएचएम की सिफारिशों के मुताबिक, एमएमयू में एक इलेक्ट्रोकार्डियोग्राम मशीन, एक रेफ्रीजरेटर और एक स्टेरेलाइइज़र होना चाहिए। प्रयास एमएमयू में ये सुविधाएं नहीं हैं।

यह पूछे जाने पर कि क्या एनएचएम मापदंडों के अनुसार एमएमयू के कामकाज के लिए आवंटित धन पर्याप्त है, राज्य के एनएचएम अधिकारियों ने कहा कि वे  इस पर कोई टिप्पणी नहीं करना चाहते।

कम बजट पर एमएमयू चलाने और पहाड़ी इलाकों में मेडिसिन और बैचलर्स ऑफ सर्जरी (एमएमबीबीएस) की डिग्री वाले डॉक्टरों की कमी के कारण प्रयास, एमबीबीएस डिग्री वाले डॉक्टर्स की बजाय, आयुर्वेदिक, यूनानी, सिद्ध और होम्योपैथी (आयुष) डॉक्टरों की सेवाएं लेता है। इंडियन मेडिकल काउंसिल एक्ट के अनुसार, ये डॉक्टर आधुनिक चिकित्सा पद्धति की प्रैक्टिस के क़ाबिल नहीं होते हैं।

प्रयास सोसायटी में मोबाइल मेडिकल यूनिट्स के प्रमुख  डॉ. विकास सिंह का कहना है कि मौजूदा बजट में सभी इकाइयों में एमबीबीएस डॉक्टरों को नियुक्त करना संभव नहीं है।

विकास सिंह ने कहा, "कोई भी एमबीबीएस डॉक्टर एक लाख रुपये महीना से कम की तनख़्वाह पर काम करने को तैयार नहीं होता। इसलिए सभी इकाइयों में एमबीबीएस डॉक्टर को रखा जाना व्यावहारिक रूप से संभव नहीं है। हमने इन इकाइयों के कामकाज की देखरेख के लिए हर ज़िले में एक एमबीबीएस डॉक्टर को नियुक्त किया है।

हेल्पएज इंडिया के हिमाचल प्रदेश प्रमुख राजेश कुमार ने कहा, ''यह तनख़्वाह  80 या 90 हज़ार रुपये महीना या इससे भी अधिक हो सकती है, अगर वे आदिवासी या दूरदराज़ के इलाक़ों में तैनात किए जाते हैं।”

हेलपएज इंडिया, देश के 24 राज्यों में 144 और हिमाचल प्रदेश में सात ज़िलों में अपने 11 यूनिट चलाता है।

हेल्पएज इंडिया का बजट, प्रयास सोसायटी के मुक़ाबले दोगुना है, लेकिन फिर भी ये एनएचएम की सिफारिश के मुताबिक सभी सुविधाएं नहीं देता है। ये संस्‍था हर साल 30 लाख रुपये प्रति यूनिट खर्च करती है। इसमें एमबीबीएस डॉक्टर, एक पंजीकृत फार्मासिस्ट, एक लैब टैकनीशियन और एक ड्राइवर की तनख़्वाह शामिल होती है। इन इकाइयों में बुनियादी दवाएं, ब्लडप्रेशर और ब्लडशुगर की जांच की सुविधाएं होती हैं।

प्रयास द्वारा संचालित इकाइयों में हेल्पएज इंडिया की तुलना में मरीज़ों की ज़्यादा पैथोलॉजिकल जांच की सुविधा होती है। इनमें कोलेस्ट्रॉल, लिवर और किडनी की जांच शामिल हैं।

कुछ एमएमयू ऐसे हैं जिनका बजट बहुत अधिक है। उदाहरण के तौर पर सोलन में हेल्पएज एमएमयू  का बजट  तीन साल के लिए 1.3 करोड़ रुपये का है। जो सालाना 45 लाख रुपये बैठता है। इसमें मूत्र और ख़ून से सम्बंधित अधिकतर जांच की जा सकती है। इसमें फीज़ियोथेरेपी की सुविधा भी मौजूद है। ये वही यूनिट है, जहां रिनझिन और उसका पति इलाज कराते हैं

इलाज के लिए नियमित एमएमयू की ज़रूरत

हिमाचल प्रदेश के ताकेरा गांव के 86 वर्षीय गुलाबो राम को डायबिटीज़ है। प्रयास की एक मोबाइल मेडिकल यूनिट उनके गांव में आई और उनका चेकअप और सात दिन के लिए दवाएं मुफ़्त दीं। वह चाहते हैं कि यूनिट बार-बार आए, ताकि उन्हें अपनी दवा लाने के लिए हर महीने 2-3 बार तीन किमी दूर स्थित अस्पताल ना जाना पड़े।

प्रयास की एक टीम ख़ून जांच करने के उपकरणों के साथ 22 अक्टूबर, 2019 को, बिलासपुर ज़िले के ताकेरा गांव के आंगनवाड़ी केंद्र पहुंची। उस दिन एमएमयू में 44 मरीज़ आए थे।

ताकेरा शिविर की प्रभारी डॉ. अंकिता शर्मा ने बताया, “हम गांव के बीच में या सामुदायिक भवनों, जैसे आंगनवाड़ी केंद्र या स्कूलों में शिविर लगाने की कोशिश करते हैं। मरीज़ यहां आसानी से पहुंच सकते हैं और ये उनके लिए सुविधाजनक भी है।”

इस तरह की इकाइयां, 86 वर्षीय गुलाबो राम जैसे अकेले रहने वाले बुजुर्गों के लिए विशेष रूप से सहायक हो सकती हैं।गुलाबो राम 15 साल से डायबिटिक हैं। उनकी पत्नी का 20 साल पहले निधन हो गया। उन्होंने बताया कि उनकी बेटियां शादीशुदा हैं और दूर रहती हैं। बेटे के साथ उनकी बातचीत बंद है। उन्होंने कहा,  “मुझे हर महीने में दो से तीन बार, अकेले 3 किमी दूर अस्पताल जाना पड़ता है। जो मेरे लिए मुश्किल है।” गुलाबो राम ने बताया कि वहां एक बार में केवल सात या 14 दिनों के लिए ही मुफ्त दवा दी जाती है।

प्रयास की टीम ने गुलाबो राम को सात दिन की दवाएं दीं। इसके बाद उन्‍हें अस्पताल जाना होगा। गुलाबो राम ने कहा कि वह चाहते थे कि मोबाइल यूनिट उनके गांव में बार-बार आए ताकि वो अस्पताल जाने से बच सकें।

प्रयास की एमएमयू इस गांव का दौरा, फिर से डेढ़ से दो महीने बाद करेगी। इसके बाद टीम घुमारवीं विधानसभा क्षेत्र के सभी बचे गांवों में जाएगी। टीम के डॉक्टरों ने कहा कि एक गांव दोबारा आने में 4-6 महीने लग सकते हैं।

एनएचएम की  गाइडलाइंस के अनुसार एमएमयू को महीने में कम से कम एक बार एक इलाके का दौरा करना चाहिए। वैसे क्षेत्रों को प्राथमिकता देनी चाहिए जहां  सुविधाएं ना के बराबर हैं।

हिमाचल प्रदेश के सोलन ज़िले के बड़ोग में एक मोबाइल हेल्थकेयर यूनिट तक पहुंचने के लिए 70 वर्षीय निर्मला देवी 13 किमी चल कर आईं हैं। उनको शिविर सरकारी पीएचसी की तुलना में अधिक भरोसेमंद लगता है। पीएचसी में डॉक्‍टर कुछ ही दिन आते हैं और उनका भी कोई समय तय नहीं होता।

हेल्पएज इंडिया, ऐसे गांवों की पहचान करता है, जो स्वास्थ्य सुविधाओं से वंचित हों और पिछड़े हों। हेल्पएज इंडिया की सोलन इकाई के सामाजिक सुरक्षा अधिकारी मनोज वर्मा ने कहा, “एमएमयू लगातार प्रत्येक सप्ताह में 5-12 गांवों का दौरा एक तय दिन करते हैं। इससे लोगों को हम पर भरोसा पैदा हो जाता है।”

जिस दिन इंडियास्पेंड ने सोलन ज़िले के बड़ोग में हेल्पएज इंडिया इकाई का दौरा किया उस दिन क़रीब 70% मरीज़ वहां फॉलो-अप के लिए आए थे। मरीज़ों ने बताया कि वे एक साल से अधिक समय से शिविर में आ रहे हैं।  

डायबीटिज़ से पीड़ित 70 साल की निर्मला देवी इलाज के लिए दो साल से नियमित रूप से यहां आ रही हैं। भले ही उनका गांव कैम्प से 13 किमी दूर है और पीएचसी उनके घर से 1 किमी दूर है। उन्होंने इंडियास्पेंड को बताया, "पीएचसी में डॉक्टर बुधवार को ही होते हैं और वह भी कुछ ही घंटों के लिए, जिसका समय भी तय नहीं है। यहां आना पीएचसी तक जाने और बिना किसी जांच और दवा के वापस लौटने से बेहतर है।"

प्रयास सोसाइटी की सभी मोबाइल मेडिकल यूनिट में एक प्रयोगशाला किट होती है जो एक सूटकेस में फिट हो जाती है। इसे कर्मचारियों को दूरदराज़ के गांवों तक ले जाने में भी आसानी होती है।

सुदूर ऊंचाई वाले ज़िलों में कम एमएमयू

हिमाचल के 26 एमएमयू  में से 22 निचले इलाकों में हैं। हेल्पएज इंडिया के चार एमएमयू ज़्यादा ऊंचाई पर स्थित, किन्नौर और कुल्लू ज़िलों में हैं।

हेल्पएज इंडिया के राजेश कुमार ने कहा, "अधिक ऊंचाई वाले क्षेत्रों में एमएमयू का संचालन करना अधिक कठिन है। वहां कर्मचारियों को ढूंढ़ना मुश्किल है, वहां सड़कों का पता लगाना और उनपर चलना मुश्किल होता है। सर्दियों के कुछ दिनों में तो हमें अपने ऑपरेशन को पूरी तरह से रोकना पड़ता है।"

Source: Seasonal and annual rainfall trends in Himachal Pradesh during 1951-2005

राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन के हिमाचल प्रदेश के मिशन डायरेक्टर निपुण जिंदल ने इंडियास्पेंड को बताया कि ज़्यादा ऊंचाई वाले स्थानों पर जहां मरीज़ों और बुज़ुर्गों का पीएचसी तक पहुंचना मुश्किल होता है, सरकार 2020 तक अपनी एमएमयू सर्विस शुरु कर देगी। राज्य की एनएचएम टीम 13 वर्षों से ऐसी इकाइयों को चालू करने की कोशिश कर रही है। लेकिन इसके लिए जारी किए गए टेंडर्स से कोई ख़ास नतीजे नहीं निकले हैं। उन्होंने कहा, "हालांकि, हम उम्मीद करते हैें कि नई जीवन धारा योजना के तहत राज्य के सभी ज़िलों में जनवरी 2020 तक, हमारे मोबाइल स्वास्थ्य और कल्याण केंद्र चालू हो जाएंगे।” राज्य की इस योजना का उद्देश्य प्रत्येक ज़िले में मोबाइल स्वास्थ्य और कल्याण केंद्रों की स्थापना करना है ताकि मुफ्त दवाएं बांटी जा सकें और 50 प्रकार की शारीरिक जांच मुहैया कराई जा सके।  

जिंदल ने कहा कि इस योजना के तहत स्थापित मोबाइल इकाइयों में एक एमबीबीएस डॉक्टर होगा। योजना एनएचएम के दिशा-निर्देशों का पालन करेगी। हालांकि, उन्होंने कहा कि सरकार का ज़ोर पीएचसी में सुधार लाने पर है। मोबाइल मेडिकल यूनिट एक दूसरे स्‍तर की सेवा है जो हम लोगों को प्रदान कर सकते हैं। हमारा प्राथमिक उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र (पीएचसी) अच्छी तरह सुविधाओं से लैस हों और काम करें।

जब तक यह उद्देश्य पूरा नहीं हो जाता, तब तक बातिर सिंह बड़ोग के एमएमयू के भरोसे हैं जहां वो हर गुरुवार को जाते हैं। बातिर, 1970 से एक दिहाड़ी मज़दूर थे। साल 2000 में एक असफल सर्जरी के बाद संक्रमण के कारण उन्हें चार और सर्जरी करानी पड़ी। इसके  बाद उनका काम-धंधा छूट गया। बातिर ने कहा, "मेरे पास एक घंटे की दूरी पर स्थित अस्पताल जाने या काम करने की अब ताक़त नहीं बची है। मुझे खुशी है कि मुझे इस तरह की सुविधा हमारे घर के पास मिल जाती  है।"

(श्रेया, इंडियास्पेंड में डेटा एनालिस्ट हैं।)

(ये रिपोर्ट मूलत: अंग्रेज़ी में 18 नवंबर 2019 को IndiaSpend पर प्रकाशित हुई है।)

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