65 वर्षों में मध्य भारत में चरम बारिश की घटनाएं तीन गुनी अधिक

यह नक्शा 1998 और 2018 के बीच वर्षा में आए बदलाव को दर्शाता है। लाल रंग में छायांकित क्षेत्र प्रति वर्ष 2 मिमी की दर से वर्षा में कमी का प्रतिनिधित्व करते हैं और नीले रंग के क्षेत्रों में उसी राशि से वर्षा में वृद्धि को दर्शाता है। स्रोत:ट्रॉपिकल रेनफॉल मेजरिंग मिशन [नेशनल एरोनॉटिक्स एंड स्पेस एडमिनिस्ट्रेशन एंड गोडार्ड स्पेस फ्लाइट सेंटर, यूएसए]; राज भगत पलानीचामी द्वारा संसाधित।

बेंगलुरु: इतिहास में दर्ज सबसे गर्म गर्मियों के बाद, भारत ने मानसून में देरी और व्यापक बाढ़ का सामना किया। उत्तर-पूर्व में असम बाढ़ से तबाह होने वाले शुरुआती राज्यों में से एक था, इसके बाद महाराष्ट्र और केरल में तबाही दिखी। मध्य अगस्त तक मध्य भारत के राज्यों में बाढ़ आने लगी।

मध्य भारत में चरम बारिश की घटनाएं 1950 और 2015 के बीच तीन गुना अधिक बढ़ गई हैं, जैसा कि पुणे के इंडियन इन्स्टिटूट ऑफ ट्रॉपिकल मेट्रोलोजी ( आईआईटीएम ), शोधकर्ताओं के नेतृत्व में 2017 के एक अध्ययन से पता चलता है। इससे 82.5 करोड़ लोग प्रभावित हुए हैं।1.7 करोड़ लोग बेघर हुए और करीब 69,000 मारे गए हैं।

तापमान में वैश्विक वृद्धि की वजह से (1 डिग्री सेल्सियस के बाद से व्यवस्थित रिकॉर्ड 1850 में शुरू हुआ ) आने वाले वर्षों में इसी तरह की बाढ़ की आशंका अधिक है, जैसा कि जलवायु परिवर्तन पर विज्ञान का आकलन करने के लिए गठन किए गए संयुक्त राष्ट्र (यूएन) निकाय, इंटरगवर्नमेंटन पैनल ऑन क्लाइमेट चेंज (आईपीसीसी) की अक्टूबर 2018 की रिपोर्ट से पता चलता है।

बेंगलुरु के भारतीय विज्ञान संस्थान (IISC), के तहत दिवेचा सेंटर फॉर क्लाइमेट चेंज (डीसीसीसी) के संस्थापक अध्यक्ष और प्रतिष्ठित प्रोफेसर, जे.श्रीनिवासन कहते हैं, "कुल वर्षा में बहुत अधिक परिवर्तन नहीं हुआ है, लेकिन अत्यधिक वर्षा में वृद्धि हुई है, और इससे अधिक बाढ़ आएगी।" 

यहां तक ​​कि 2019 में, भारत में 1 फीसदी से अधिक बारिश के साथ, वर्षा के समाप्त होने की संभावना है, जबकि देश के बड़े हिस्से में वर्षा की कमी है।

Large parts of Arunachal Pradesh, Karnataka and Andhra Pradesh face a rainfall deficit, according to the Drought Early Warning System (DEWS), a real-time drought monitoring platform. Source: Drought Early Warning System (DEWS) website, as on August 21, 2019

जल संसाधन मंत्री गजेंद्र सिंह शेखावत ने जुलाई 2019 में राज्य सभा को बताया कि भारत में प्रति व्यक्ति पानी की उपलब्धता 1,544 क्यूबिक मीटर है। वहीं 2001 में यह 1,816 क्यूबिक मीटर थी। निम्न मध्यम आय वाले देशों के लिए औसत, जिस समूह का भारत हिस्सा है, इसकी प्रति व्यक्ति आय के आधार पर, 3,013 क्यूबिक मीटर है।उच्च आय वाले देशों के लिए, 8,822 क्यूबिक मीटर है।

श्रीनिवासन ने कहा, "हमारी प्रति व्यक्ति पानी की उपलब्धता दुनिया में सबसे कम है, और इसलिए हमें सावधानी से पानी का उपयोग करने की आवश्यकता है। 72 साल पहले ऐसी जरूरत नहीं थी, जब हमारी आबादी सिर्फ 35 करोड़ थी।"

‘अनिश्चित' मानसून

गर्मियों में, जब भूमि समुद्र की तुलना में तेजी से गर्म होती है, तो गर्म हवा निकलती है और हवा का दबाव कम हो जाता है। इससे महासागरों में हवा चलती है, जिससे उनके साथ नमी आती है, जो बारिश के रूप में गिरती है। सर्दियों में, यह प्रक्रिया उलट जाती है। यह वार्षिक पवन चालित मौसम पैटर्न को मानसून के रूप में जाना जाता है। भारत के अलावा, यह प्रक्रिया अफ्रीका, ऑस्ट्रेलिया और उत्तरी और दक्षिणी अमेरिका के कुछ हिस्सों में बारिश लाती है।

भारतीय मानसून भारत की वार्षिक वर्षा के 85 फीसदी के करीब है।

कनाडा के वैंकूवर में वाशिंगटन स्टेट यूनिवर्सिटी के स्कूल ऑफ एन्वायर्नमेंट में सहायक प्रोफेसर, दीप्ति सिंह कहती हैं, "मानसून की शुरुआत और इसकी ताकत को प्रभावित करने वाले मुख्य कारकों में से एक भारतीय उपमहाद्वीप और उष्णकटिबंधीय भारतीय महासागर के बीच तापमान में कमी है।"

भारत के अधिकांश हिस्से में साल में चार महीने बारिश होती है । वैज्ञानिक इस बात को लेकर एकमत नहीं हैं कि भारतीय मानसून अनिश्चित है या नहीं। सिंह ने कहा कि यह इस बात पर निर्भर करता है कि आप किससे पूछते हैं।

श्रीनिवासन ने कहा, "अगर आप भारतीय मानसून को देखते हैं तो अंतर-वार्षिक भिन्नता 10 फीसदी है। हमारा समाज हजारों वर्षों से इस बदलाव के साथ जी रहा है, लेकिन अब हम खराब जल प्रबंधन प्रथाओं के कारण सामना करने में असमर्थ हैं।"

शोध के अनुसार, भारतीय मानसून ‘महत्वपूर्ण तरीकों’ से बदल रहा है।

सिंह और उनके सहयोगियों द्वारा मौजूदा अध्ययनों की जनवरी 2019 में की गई समीक्षा कहती है कि कुल मिलाकर, मानसून ‘दीर्घकाल में कमजोर’ था। 1950 के दशक के बाद से मध्य भारत में बारिश में गिरावट आई है, और हाल ही में, यह उत्तर पश्चिमी राजस्थान और प्रायद्वीपीय भारत के कुछ हिस्सों में बढ़ी है।

लेकिन यहां चर्चा के लिए एक और बात है।

यह वर्षा आने वाली है और भविष्य के लिए तबाही के स्तर पर इसकी आशंका व्यक्त की जा रही है और कई इलाकों में भयानक सूखा। यह खेती को अस्थिर बनाता है, जैसा कि इंडियास्पेंड ने मई 2019 में राजस्थान से रिपोर्ट किया था। समीक्षा के अनुसार, सूखे की घटना ज्यादा हो जाएगी। सिंह कहते हैं, "कुल मिलाकर, मॉनसून कमजोर हुआ है और मॉनसून की परिवर्तनशीलता (एक मौसम और दिन-प्रतिदिन) बढ़ी है।" श्रीनिवासन की तरह सिंह ने जोर देकर कहा कि औसत वर्षा में पर्याप्त अंतर नहीं आया है।

क्या जलवायु परिवर्तन जिम्मेदार है?

वर्षा कई कारकों पर निर्भर करती है, कुछ स्थानीय, अन्य वैश्विक। एयरोसोल्स के कारण प्रदूषण ( हवा में निलंबित ठोस या तरल कण ) स्थानीय स्तर पर वर्षा को कमजोर करने और उपमहाद्वीप में वर्षा पैटर्न को स्थानांतरित करने के लिए जाना जाता है, जैसा कि इंडियास्पेंड ने मार्च 2019 में बताया है, जबकि तापमान में वैश्विक वृद्धि मानसून को मजबूत करने के लिए जानी जाती है।

दीर्घकालिक अनुमानों से पता चलता है कि वर्षा के पैटर्न में बदलाव होगा: भारत के अधिकांश हिस्सों में वर्षा में वृद्धि होने की संभावना है, क्योंकि ग्रीनहाउस गैसों से एरोसोल (या वायु प्रदूषक) होता है।

स्थानीय वायु प्रदूषण का प्रभाव पर्याप्त है, क्योंकि भारतीय शहर 2018 में विश्व के सबसे प्रदूषित शहरों की विश्व स्वास्थ्य संगठन सूची के सभी शीर्ष पांच स्लॉटों पर कब्जा कर लेते हैं, जो उन कणों के लिए मापा जाता है जो व्यास में 2.5 माइक्रोन (पीएम 2.5) या उससे कम या लगभग 30 गुना महीन होते हैं।

"मानसून में बदलाव का प्रतिनिधित्व एक चुनौती है क्योंकि कई कारक हैं ( ग्रीनहाउस गैसों, स्थानीय और दूरस्थ एयरोसोल उत्सर्जन, और व्यापक भू-उपयोग भूमि-कवर परिवर्तन )जो बदल रहे हैं, और इन कारकों में प्रतिस्पर्धा प्रभाव है। हालांकि, 20 वीं सदी के मध्य से मानसून के कमजोर होने में अब तक के अधिकांश वैज्ञानिक प्रमाण एरोसोल की प्रमुख भूमिका की ओर इशारा करते हैं।"

2019 मानसून का मौसम, घाटे की बारिश की आशंका के साथ शुरू हुआ, जिसे अधिकारियों ने प्राकृतिक मानसून चक्र या युग के रूप में समझाया।वायुमंडलीय वैज्ञानिक और पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय के सचिव, माधवन राजीव ने कहा, “कुछ युगों में हमारे पास कम वर्षा होगी। हम एक निम्न युग के दौर में जा रहे हैं। हमने सोचा कि यह एक सकारात्मक युग में चलेगा, लेकिन ऐसा नहीं हो रहा है। यह एक जलवायु परिवर्तन विपथन हो सकता है।

यह पूछे जाने पर कि क्या मानसून पैटर्न में बदलाव जलवायु परिवर्तन का परिणाम है, राजीवन ने कहा: “यह हो सकता है। मैं यही कहूंगा कि ऐसा हो सकता है।”

इसलिए, विशेषज्ञों का मानना है कि जलवायु परिवर्तन के कारण वर्षा की अधिकता हो सकती है, बाढ़ नहीं हो सकती है। फिर क्या? खराब योजना।

बाढ़, पर्यावरण का नहीं, बल्कि एक नियोजन आपदा

बाढ़ से होने वाली क्षति भारी वर्षा और मानव निर्मित गतिविधियों का एक संयोजन है। इस साल महाराष्ट्र की कृष्णा नदी और पिछले साल केरल की पेरियार नदी के किनारे बांध उस समय खोले गए थे जब आसपास के गांव जलमग्न हो गए थे, जिससे बाढ़ और भी बढ़ गई थी।

अक्सर, बांधों से निकलने वाला पानी निर्माण द्वारा पहले से ही बाधित नदियों में बह जाता है। डीसीसीसी के श्रीनिवासन ने बताया, “नियम बहुत सरल हैं। भारत में अधिकांश नदियां मानसून के दौरान थोड़ा भटकेंगी। उन्हें जगह दें। कई शहरों में इतना निर्माण हो चुका है, नदी को हिलने-डुलने का कोई स्थान नहीं है। आप लोगों को वहां निर्माण करने की अनुमति दे रहे हैं, जहां कोई निर्माण नहीं होना चाहिए। ”

पहाड़ियों और टीलों में अंधाधुंध निर्माण भूस्खलन का कारण बनता है। श्रीनिवासन ने कहा, "केरल में पिछले साल की तुलना में इस साल की बारिश उतनी भारी नहीं है। उत्खनन ( इस वर्ष) के कारण बहुत विनाश हुआ है।"

केरल में, 8 अगस्त, 2019 से चार दिनों में 76 लोगों की मौत हो गई और 83 भूस्खलन की घटनाओं 28 की मृत्यु हुई हुई है। यह पर्यावरण के संवेदनशीलता का मामला है और जैव-विविधता वाले पश्चिमी घाटों में अत्यधिक उत्खनन का नतीजा माना जाता है।

जलवायु जोखिम को ट्रैक करने वाले एक जर्मन गैर-लाभकारी संस्था की ओर से 2018 की रिपोर्ट के अनुसार, 1998 और 2017 के बीच चरम मौसम की घटनाओं का अनुभव करने के लिए भारत दुनिया के शीर्ष 20 देशों में शामिल है।

भारत के वर्ल्ड रीसोर्स संसाधन इन्स्टिटूट (डब्ल्यूआरआई) में क्लाइमेट के रिजिल्यन्स का अध्ययन करने वाली नम्रता गिनोया ने कहा, "अनिश्चितता और भी अधिक बढ़ गई है। सूखे की आशंका वाले क्षेत्रों में बाढ आए हैं, जो एक दुर्लभ घटना है।"

गिनोया ने कहा, "हमारे केंद्रीय और राज्य के विभागों में सूखाग्रस्त क्षेत्रों के लिए योजनाएं हैं, लेकिन अकेले उन योजनाओं से समस्या का हल नहीं होगा। उन्हीं क्षेत्रों (जो सूखाग्रस्त हैं) को अत्यधिक वर्षा की घटनाओं के लिए योजनाएं बनानी होंगी।" 

मेघालय में चेरापूंजी, पहले से ही पानी की कमी से जूझ रहा है।

जबकि सरकार बेहतर योजना बनाने के लिए संघर्ष करती है,जीवित रहने की रणनीति के रूप में प्रवासन का उपयोग करते हुए समुदायों को अनुकूलन करने के लिए मजबूर होना पड़ता है।

 महिलाओं को पीछे छोड़ते हुए पलायन

भारत पर्यावरणीय प्रवासियों को ट्रैक नहीं करता है, इसलिए यह स्पष्ट नहीं है कि संख्या कितनी है, हालांकि इस तरह के प्रवास के ढेर सारे सबूत हैं, जैसा कि इंडियास्पेंड ने सितंबर 2018 में बताया था।

जबकि सभी प्रवासन पर्यावरणीय मुद्दों से प्रेरित नहीं होते हैं, जो नई चुनौतियों का सामना कर सकते हैं।

बेंगलुरु में इंडियन इंस्टीट्यूट फॉर ह्यूमन सेटलमेंट्स में पर्यावरणीय सामाजिक वैज्ञानिक चांदनी सिंह ने पता लगाया गया था कि समुदाय किस तरह से बदलती जलवायु का जवाब दे रहे हैं। उन्होंने मार्च 2017 के पेपर का सह-लेखन किया था। वह कहती हैं, “जब लोग ग्रामीण क्षेत्रों में सूखे और पानी की कमी से निपटने के लिए (उदाहरण के लिए, कर्नाटक में कोलार, गुलबर्गा और रायचूर जैसे जल-दुर्लभ जिले) पलायन करते हैं, तो वे नए जोखिमों का सामना करते हैं, कुछ ऐसा जिसके वे आदि नहीं हैं।”

इसने मुख्य रूप से पुरुष प्रवासन को बढ़ाया है।

सिंह ने कहा, "यह कदम बदल रहा है कि घरों को कैसे कॉन्फ़िगर किया जाता है और घर के भीतर श्रम कैसे विभाजित होता है। इसलिए, हमने कोलार से बेंगलुरु आने वाले पुरुषों की कहानियों को एकत्र किया, जिन्होंने घरों में महिलाओं को 'पीछे छोड़ दिया' था और वह खेती के अतिरिक्त काम (जो पहले पुरुष करते थे) को देख रही थीं।"

कुछ महिलाओं ने ‘फंसा हुआ’ महसूस किया। पुरुष प्रवासियों ने प्रवास के बाद काम की कठिन परिस्थितियों की सूचना दी।महाराष्ट्र में ईंट भट्ठा कारखानों जैसे नए क्षेत्रों में स्थानांतरन, अक्सर चाइल्डकैअर के लिए समर्थन प्रणालियों के बिना कठिन मैनुअल काम में शामिल थे।

सकारात्मक पक्ष पर, कर्नाटक के गुलबर्गा और कोलार जिलों में किसानों ने जलवायु परिवर्तन का सामना करने के लिए मिट्टी और जल प्रबंधन तकनीकों और स्वदेशी जलवायु-लचीला फसल किस्मों को रोपने जैसे नवीन तरीकों का इस्तेमाल किया। चांदनी और उनके सहयोगियों ने 2018 के पेपर में बताया कि बदलाव में ड्रिप सिंचाई,जैविक खेती और वर्षा जल संचयन जैसी नई चीजें शामिल हैं।

जरूरत है एक नए डील की

 सरकार इस बात से सहमत है कि अत्यधिक मौसम की घटनाओं में वृद्धि से निपटने के लिए बेहतर नीति की आवश्यकता है।

पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय के राजीवन ने कहा, "हमारे पास जल प्रबंधन के लिए अच्छी नीति होनी चाहिए। कृषि में भी, हमारे पास उपयुक्त फसलों की बुवाई के लिए एक नीति होनी चाहिए। यह अवधि (कम वर्षा का) कुछ वर्षों तक जारी रह सकती है। इसलिए, हमारे पास उस तरह की रणनीति होनी चाहिए। ”

अन्य लोग पानी के प्रबंधन पर एक कड़ाई से बदलाव की वकालत करते हैं, जो भूजल नीति पर पानी की निकासी की निगरानी करे। डब्लूआरआई के गिनोय ने कहा, “ हम पानी को एक वस्तु के रूप में देखते हैं और पानी को हम महत्व नहीं देते हैं।”

1947 के बाद से, भारत की आबादी चार गुना बढ़ गई है। डीसीसीसी के श्रीनिवासन ने कहा, "इसका मतलब है कि प्रति व्यक्ति पानी उपलब्धता अब एक-चौथाई है।"

भारत के मानसून का बदलता स्वरूप एक चिंता का विषय है, लेकिन यह जनसंख्या वृद्धि की समस्या और अव्यवस्थित योजना के साथ एक अतिरिक्त तनाव भी है।

(शेट्टी इंडियास्पेंड में रिपोर्टिंग फेलो हैं।)

यह आलेख मूलत: अंग्रेजी में 5 सितंबर 2019 को IndiaSpend.com पर प्रकाशित हुआ है।

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बेंगलुरु: इतिहास में दर्ज सबसे गर्म गर्मियों के बाद, भारत ने मानसून में देरी और व्यापक बाढ़ का सामना किया। उत्तर-पूर्व में असम बाढ़ से तबाह होने वाले शुरुआती राज्यों में से एक था, इसके बाद महाराष्ट्र और केरल में तबाही दिखी। मध्य अगस्त तक मध्य भारत के राज्यों में बाढ़ आने लगी।

मध्य भारत में चरम बारिश की घटनाएं 1950 और 2015 के बीच तीन गुना अधिक बढ़ गई हैं, जैसा कि पुणे के इंडियन इन्स्टिटूट ऑफ ट्रॉपिकल मेट्रोलोजी ( आईआईटीएम ), शोधकर्ताओं के नेतृत्व में 2017 के एक अध्ययन से पता चलता है। इससे 82.5 करोड़ लोग प्रभावित हुए हैं।1.7 करोड़ लोग बेघर हुए और करीब 69,000 मारे गए हैं।

तापमान में वैश्विक वृद्धि की वजह से (1 डिग्री सेल्सियस के बाद से व्यवस्थित रिकॉर्ड 1850 में शुरू हुआ ) आने वाले वर्षों में इसी तरह की बाढ़ की आशंका अधिक है, जैसा कि जलवायु परिवर्तन पर विज्ञान का आकलन करने के लिए गठन किए गए संयुक्त राष्ट्र (यूएन) निकाय, इंटरगवर्नमेंटन पैनल ऑन क्लाइमेट चेंज (आईपीसीसी) की अक्टूबर 2018 की रिपोर्ट से पता चलता है।

बेंगलुरु के भारतीय विज्ञान संस्थान (IISC), के तहत दिवेचा सेंटर फॉर क्लाइमेट चेंज (डीसीसीसी) के संस्थापक अध्यक्ष और प्रतिष्ठित प्रोफेसर, जे.श्रीनिवासन कहते हैं, "कुल वर्षा में बहुत अधिक परिवर्तन नहीं हुआ है, लेकिन अत्यधिक वर्षा में वृद्धि हुई है, और इससे अधिक बाढ़ आएगी।" 

यहां तक ​​कि 2019 में, भारत में 1 फीसदी से अधिक बारिश के साथ, वर्षा के समाप्त होने की संभावना है, जबकि देश के बड़े हिस्से में वर्षा की कमी है।

Large parts of Arunachal Pradesh, Karnataka and Andhra Pradesh face a rainfall deficit, according to the Drought Early Warning System (DEWS), a real-time drought monitoring platform. Source: Drought Early Warning System (DEWS) website, as on August 21, 2019

जल संसाधन मंत्री गजेंद्र सिंह शेखावत ने जुलाई 2019 में राज्य सभा को बताया कि भारत में प्रति व्यक्ति पानी की उपलब्धता 1,544 क्यूबिक मीटर है। वहीं 2001 में यह 1,816 क्यूबिक मीटर थी। निम्न मध्यम आय वाले देशों के लिए औसत, जिस समूह का भारत हिस्सा है, इसकी प्रति व्यक्ति आय के आधार पर, 3,013 क्यूबिक मीटर है।उच्च आय वाले देशों के लिए, 8,822 क्यूबिक मीटर है।

श्रीनिवासन ने कहा, "हमारी प्रति व्यक्ति पानी की उपलब्धता दुनिया में सबसे कम है, और इसलिए हमें सावधानी से पानी का उपयोग करने की आवश्यकता है। 72 साल पहले ऐसी जरूरत नहीं थी, जब हमारी आबादी सिर्फ 35 करोड़ थी।"

‘अनिश्चित' मानसून

गर्मियों में, जब भूमि समुद्र की तुलना में तेजी से गर्म होती है, तो गर्म हवा निकलती है और हवा का दबाव कम हो जाता है। इससे महासागरों में हवा चलती है, जिससे उनके साथ नमी आती है, जो बारिश के रूप में गिरती है। सर्दियों में, यह प्रक्रिया उलट जाती है। यह वार्षिक पवन चालित मौसम पैटर्न को मानसून के रूप में जाना जाता है। भारत के अलावा, यह प्रक्रिया अफ्रीका, ऑस्ट्रेलिया और उत्तरी और दक्षिणी अमेरिका के कुछ हिस्सों में बारिश लाती है।

भारतीय मानसून भारत की वार्षिक वर्षा के 85 फीसदी के करीब है।

कनाडा के वैंकूवर में वाशिंगटन स्टेट यूनिवर्सिटी के स्कूल ऑफ एन्वायर्नमेंट में सहायक प्रोफेसर, दीप्ति सिंह कहती हैं, "मानसून की शुरुआत और इसकी ताकत को प्रभावित करने वाले मुख्य कारकों में से एक भारतीय उपमहाद्वीप और उष्णकटिबंधीय भारतीय महासागर के बीच तापमान में कमी है।"

भारत के अधिकांश हिस्से में साल में चार महीने बारिश होती है । वैज्ञानिक इस बात को लेकर एकमत नहीं हैं कि भारतीय मानसून अनिश्चित है या नहीं। सिंह ने कहा कि यह इस बात पर निर्भर करता है कि आप किससे पूछते हैं।

श्रीनिवासन ने कहा, "अगर आप भारतीय मानसून को देखते हैं तो अंतर-वार्षिक भिन्नता 10 फीसदी है। हमारा समाज हजारों वर्षों से इस बदलाव के साथ जी रहा है, लेकिन अब हम खराब जल प्रबंधन प्रथाओं के कारण सामना करने में असमर्थ हैं।"

शोध के अनुसार, भारतीय मानसून ‘महत्वपूर्ण तरीकों’ से बदल रहा है।

सिंह और उनके सहयोगियों द्वारा मौजूदा अध्ययनों की जनवरी 2019 में की गई समीक्षा कहती है कि कुल मिलाकर, मानसून ‘दीर्घकाल में कमजोर’ था। 1950 के दशक के बाद से मध्य भारत में बारिश में गिरावट आई है, और हाल ही में, यह उत्तर पश्चिमी राजस्थान और प्रायद्वीपीय भारत के कुछ हिस्सों में बढ़ी है।

लेकिन यहां चर्चा के लिए एक और बात है।

यह वर्षा आने वाली है और भविष्य के लिए तबाही के स्तर पर इसकी आशंका व्यक्त की जा रही है और कई इलाकों में भयानक सूखा। यह खेती को अस्थिर बनाता है, जैसा कि इंडियास्पेंड ने मई 2019 में राजस्थान से रिपोर्ट किया था। समीक्षा के अनुसार, सूखे की घटना ज्यादा हो जाएगी। सिंह कहते हैं, "कुल मिलाकर, मॉनसून कमजोर हुआ है और मॉनसून की परिवर्तनशीलता (एक मौसम और दिन-प्रतिदिन) बढ़ी है।" श्रीनिवासन की तरह सिंह ने जोर देकर कहा कि औसत वर्षा में पर्याप्त अंतर नहीं आया है।

क्या जलवायु परिवर्तन जिम्मेदार है?

वर्षा कई कारकों पर निर्भर करती है, कुछ स्थानीय, अन्य वैश्विक। एयरोसोल्स के कारण प्रदूषण ( हवा में निलंबित ठोस या तरल कण ) स्थानीय स्तर पर वर्षा को कमजोर करने और उपमहाद्वीप में वर्षा पैटर्न को स्थानांतरित करने के लिए जाना जाता है, जैसा कि इंडियास्पेंड ने मार्च 2019 में बताया है, जबकि तापमान में वैश्विक वृद्धि मानसून को मजबूत करने के लिए जानी जाती है।

दीर्घकालिक अनुमानों से पता चलता है कि वर्षा के पैटर्न में बदलाव होगा: भारत के अधिकांश हिस्सों में वर्षा में वृद्धि होने की संभावना है, क्योंकि ग्रीनहाउस गैसों से एरोसोल (या वायु प्रदूषक) होता है।

स्थानीय वायु प्रदूषण का प्रभाव पर्याप्त है, क्योंकि भारतीय शहर 2018 में विश्व के सबसे प्रदूषित शहरों की विश्व स्वास्थ्य संगठन सूची के सभी शीर्ष पांच स्लॉटों पर कब्जा कर लेते हैं, जो उन कणों के लिए मापा जाता है जो व्यास में 2.5 माइक्रोन (पीएम 2.5) या उससे कम या लगभग 30 गुना महीन होते हैं।

"मानसून में बदलाव का प्रतिनिधित्व एक चुनौती है क्योंकि कई कारक हैं ( ग्रीनहाउस गैसों, स्थानीय और दूरस्थ एयरोसोल उत्सर्जन, और व्यापक भू-उपयोग भूमि-कवर परिवर्तन )जो बदल रहे हैं, और इन कारकों में प्रतिस्पर्धा प्रभाव है। हालांकि, 20 वीं सदी के मध्य से मानसून के कमजोर होने में अब तक के अधिकांश वैज्ञानिक प्रमाण एरोसोल की प्रमुख भूमिका की ओर इशारा करते हैं।"

2019 मानसून का मौसम, घाटे की बारिश की आशंका के साथ शुरू हुआ, जिसे अधिकारियों ने प्राकृतिक मानसून चक्र या युग के रूप में समझाया।वायुमंडलीय वैज्ञानिक और पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय के सचिव, माधवन राजीव ने कहा, “कुछ युगों में हमारे पास कम वर्षा होगी। हम एक निम्न युग के दौर में जा रहे हैं। हमने सोचा कि यह एक सकारात्मक युग में चलेगा, लेकिन ऐसा नहीं हो रहा है। यह एक जलवायु परिवर्तन विपथन हो सकता है।

यह पूछे जाने पर कि क्या मानसून पैटर्न में बदलाव जलवायु परिवर्तन का परिणाम है, राजीवन ने कहा: “यह हो सकता है। मैं यही कहूंगा कि ऐसा हो सकता है।”

इसलिए, विशेषज्ञों का मानना है कि जलवायु परिवर्तन के कारण वर्षा की अधिकता हो सकती है, बाढ़ नहीं हो सकती है। फिर क्या? खराब योजना।

बाढ़, पर्यावरण का नहीं, बल्कि एक नियोजन आपदा

बाढ़ से होने वाली क्षति भारी वर्षा और मानव निर्मित गतिविधियों का एक संयोजन है। इस साल महाराष्ट्र की कृष्णा नदी और पिछले साल केरल की पेरियार नदी के किनारे बांध उस समय खोले गए थे जब आसपास के गांव जलमग्न हो गए थे, जिससे बाढ़ और भी बढ़ गई थी।

अक्सर, बांधों से निकलने वाला पानी निर्माण द्वारा पहले से ही बाधित नदियों में बह जाता है। डीसीसीसी के श्रीनिवासन ने बताया, “नियम बहुत सरल हैं। भारत में अधिकांश नदियां मानसून के दौरान थोड़ा भटकेंगी। उन्हें जगह दें। कई शहरों में इतना निर्माण हो चुका है, नदी को हिलने-डुलने का कोई स्थान नहीं है। आप लोगों को वहां निर्माण करने की अनुमति दे रहे हैं, जहां कोई निर्माण नहीं होना चाहिए। ”

पहाड़ियों और टीलों में अंधाधुंध निर्माण भूस्खलन का कारण बनता है। श्रीनिवासन ने कहा, "केरल में पिछले साल की तुलना में इस साल की बारिश उतनी भारी नहीं है। उत्खनन ( इस वर्ष) के कारण बहुत विनाश हुआ है।"

केरल में, 8 अगस्त, 2019 से चार दिनों में 76 लोगों की मौत हो गई और 83 भूस्खलन की घटनाओं 28 की मृत्यु हुई हुई है। यह पर्यावरण के संवेदनशीलता का मामला है और जैव-विविधता वाले पश्चिमी घाटों में अत्यधिक उत्खनन का नतीजा माना जाता है।

जलवायु जोखिम को ट्रैक करने वाले एक जर्मन गैर-लाभकारी संस्था की ओर से 2018 की रिपोर्ट के अनुसार, 1998 और 2017 के बीच चरम मौसम की घटनाओं का अनुभव करने के लिए भारत दुनिया के शीर्ष 20 देशों में शामिल है।

भारत के वर्ल्ड रीसोर्स संसाधन इन्स्टिटूट (डब्ल्यूआरआई) में क्लाइमेट के रिजिल्यन्स का अध्ययन करने वाली नम्रता गिनोया ने कहा, "अनिश्चितता और भी अधिक बढ़ गई है। सूखे की आशंका वाले क्षेत्रों में बाढ आए हैं, जो एक दुर्लभ घटना है।"

गिनोया ने कहा, "हमारे केंद्रीय और राज्य के विभागों में सूखाग्रस्त क्षेत्रों के लिए योजनाएं हैं, लेकिन अकेले उन योजनाओं से समस्या का हल नहीं होगा। उन्हीं क्षेत्रों (जो सूखाग्रस्त हैं) को अत्यधिक वर्षा की घटनाओं के लिए योजनाएं बनानी होंगी।" 

मेघालय में चेरापूंजी, पहले से ही पानी की कमी से जूझ रहा है।

जबकि सरकार बेहतर योजना बनाने के लिए संघर्ष करती है,जीवित रहने की रणनीति के रूप में प्रवासन का उपयोग करते हुए समुदायों को अनुकूलन करने के लिए मजबूर होना पड़ता है।

 महिलाओं को पीछे छोड़ते हुए पलायन

भारत पर्यावरणीय प्रवासियों को ट्रैक नहीं करता है, इसलिए यह स्पष्ट नहीं है कि संख्या कितनी है, हालांकि इस तरह के प्रवास के ढेर सारे सबूत हैं, जैसा कि इंडियास्पेंड ने सितंबर 2018 में बताया था।

जबकि सभी प्रवासन पर्यावरणीय मुद्दों से प्रेरित नहीं होते हैं, जो नई चुनौतियों का सामना कर सकते हैं।

बेंगलुरु में इंडियन इंस्टीट्यूट फॉर ह्यूमन सेटलमेंट्स में पर्यावरणीय सामाजिक वैज्ञानिक चांदनी सिंह ने पता लगाया गया था कि समुदाय किस तरह से बदलती जलवायु का जवाब दे रहे हैं। उन्होंने मार्च 2017 के पेपर का सह-लेखन किया था। वह कहती हैं, “जब लोग ग्रामीण क्षेत्रों में सूखे और पानी की कमी से निपटने के लिए (उदाहरण के लिए, कर्नाटक में कोलार, गुलबर्गा और रायचूर जैसे जल-दुर्लभ जिले) पलायन करते हैं, तो वे नए जोखिमों का सामना करते हैं, कुछ ऐसा जिसके वे आदि नहीं हैं।”

इसने मुख्य रूप से पुरुष प्रवासन को बढ़ाया है।

सिंह ने कहा, "यह कदम बदल रहा है कि घरों को कैसे कॉन्फ़िगर किया जाता है और घर के भीतर श्रम कैसे विभाजित होता है। इसलिए, हमने कोलार से बेंगलुरु आने वाले पुरुषों की कहानियों को एकत्र किया, जिन्होंने घरों में महिलाओं को 'पीछे छोड़ दिया' था और वह खेती के अतिरिक्त काम (जो पहले पुरुष करते थे) को देख रही थीं।"

कुछ महिलाओं ने ‘फंसा हुआ’ महसूस किया। पुरुष प्रवासियों ने प्रवास के बाद काम की कठिन परिस्थितियों की सूचना दी।महाराष्ट्र में ईंट भट्ठा कारखानों जैसे नए क्षेत्रों में स्थानांतरन, अक्सर चाइल्डकैअर के लिए समर्थन प्रणालियों के बिना कठिन मैनुअल काम में शामिल थे।

सकारात्मक पक्ष पर, कर्नाटक के गुलबर्गा और कोलार जिलों में किसानों ने जलवायु परिवर्तन का सामना करने के लिए मिट्टी और जल प्रबंधन तकनीकों और स्वदेशी जलवायु-लचीला फसल किस्मों को रोपने जैसे नवीन तरीकों का इस्तेमाल किया। चांदनी और उनके सहयोगियों ने 2018 के पेपर में बताया कि बदलाव में ड्रिप सिंचाई,जैविक खेती और वर्षा जल संचयन जैसी नई चीजें शामिल हैं।

जरूरत है एक नए डील की

 सरकार इस बात से सहमत है कि अत्यधिक मौसम की घटनाओं में वृद्धि से निपटने के लिए बेहतर नीति की आवश्यकता है।

पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय के राजीवन ने कहा, "हमारे पास जल प्रबंधन के लिए अच्छी नीति होनी चाहिए। कृषि में भी, हमारे पास उपयुक्त फसलों की बुवाई के लिए एक नीति होनी चाहिए। यह अवधि (कम वर्षा का) कुछ वर्षों तक जारी रह सकती है। इसलिए, हमारे पास उस तरह की रणनीति होनी चाहिए। ”

अन्य लोग पानी के प्रबंधन पर एक कड़ाई से बदलाव की वकालत करते हैं, जो भूजल नीति पर पानी की निकासी की निगरानी करे। डब्लूआरआई के गिनोय ने कहा, “ हम पानी को एक वस्तु के रूप में देखते हैं और पानी को हम महत्व नहीं देते हैं।”

1947 के बाद से, भारत की आबादी चार गुना बढ़ गई है। डीसीसीसी के श्रीनिवासन ने कहा, "इसका मतलब है कि प्रति व्यक्ति पानी उपलब्धता अब एक-चौथाई है।"

भारत के मानसून का बदलता स्वरूप एक चिंता का विषय है, लेकिन यह जनसंख्या वृद्धि की समस्या और अव्यवस्थित योजना के साथ एक अतिरिक्त तनाव भी है।

(शेट्टी इंडियास्पेंड में रिपोर्टिंग फेलो हैं।)

यह आलेख मूलत: अंग्रेजी में 5 सितंबर 2019 को IndiaSpend.com पर प्रकाशित हुआ है।

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